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बाल विवाह एक त्रासदी

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बाल विवाह एक सामाजिक कलंक एवं अभिशाप है। हमारे देश में, खासकर ग्रामीण अंचलों में यह कुप्रथा लम्बे समय से चली आ रही है। विशेष रूप से अक्षय तृतीय के दिन असंख्य बाल विवाह सम्पन्न होते रहे हैं। बाल विवाह की कुप्रथा तो यहां तक व्याप्त है कि कुछ लोग गर्भाधीन बच्चों का भी सम्बंध तय कर लेते हैं। इसके परिणाम अत्यंत घातक होते हैं। आज समाज के सामने बाल विवाह की एक ज्वलंत समस्या है।
बाल विवाह को रोकने के लिए समय-समय पर कानून भी बनते रहे हैं। सन् 1929 में बाल विवाह अवरोध अधिनियम पारित किया गया। जब यह देश, काल एवं परिस्थितियों के अनुकूल नहीं रहा तो सन् 2007 में बाल विवाह निषेध अधिनियम पारित किया गया। यह अधिनियम सम्पूर्ण भारत पर लागू है।
इस अधिनियम में बाल विवाह का निषेध किया गया है तथा दण्ड का प्रावधान भी किया है। अधिनियम में बालक ऐसे व्यक्ति को माना गया है, जो यदि पुरुष है तो 21 वर्ष से कम एवं स्त्री है तो 18 वर्ष से कम आयु की है। बाल विवाह से अभिप्राय ऐसे विवाह से है, जिसके दोनों पक्षकारों (वर-वधू) में से कोई भी एक या दोनों बालक हैं।
अधिनियम की धारा 9, 10 एवं 11 में बाल विवाह के लिए दण्ड की व्यवस्था की गई है। इसमें निम्नांकित व्यक्तियों को दो वर्ष तक की अवधि के कठोर कारावास या एक लाख रुपए तक के जुर्माने या दोनों से दण्डित किए जाने का प्रावधान है।
(क) किसी बाल स्त्री से विवाह करने वाला वयस्क पुरुष,
(ख) बाल विवाह का संचालन, निदेशन अथवा दुष्प्रेरण करने वाला व्यक्ति, एवं
(ग) बाल विवाह को प्रोत्साहित एवं अनुष्ठापित करने की अनुज्ञा देने वाला व्यक्ति।
स्पष्ट है कि बाल विवाह करने वाला व्यक्ति, बाल विवाह कराने वाले व्यक्ति एवं बाल विवाह को प्रोत्साहित एवं अनुष्ठापित करने वाले सभी व्यक्ति दोषी ठहराए जा सकते हैं।
इसके अलावा अधिनियम में और भी कठोर प्रावधान किए गए हैं, जैसे- बाल विवाह को शून्यकरणीय माना गया है। अर्थात् बाल विवाह को किसी पक्षकार द्वारा ऐसे विवाह को शून्य घोषित कराया जा सकता है। बाल विवाह में पक्षकारों अर्थात् वर-वधू के भरण-पोषण का दायित्व उनके माता-पिता पर अधिरोपित किया गया है। बाल विवाह के अपराध में किसी व्यक्ति को वारंट के बिना गिरफ्तार किया जा सकता है। इसे अजमानतीय अपराध बनाया गया है।
बाल विवाह प्रतिषेध के लिए धारा 13 के अंतर्गत न्यायिक मजिस्ट्रेट से व्यादेश (स्टे) भी प्राप्त किया जा सकता है, अर्थात् बाल विवाह को मजिस्ट्रेट के आदेश से रुकवाया जा सकता है।
इन सबके बावजूद कटु सत्य यह है कि केवल कानून से बाल विवाह को रोका जाना असम्भव है। इसके लिए समाज एवं सरकार का अहम् दायित्व बनता है। इसके लिए जनचेतना आवश्यक है। बाल विवाह का बहुत बड़ा कारण अशिक्षा एवं निर्धनता भी है। शिक्षा, रोजगार एवं आर्थिक अनुदान से बाल विवाह को काफी हद तक रोका जा सकता है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह बाल विवाह को रोकने की दिशा में यथासम्भव पहल करें।

- डॉ. बसंतीलाल बाबेल, पूर्व न्यायाधीश

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