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क्लिनिकों पर तैयार होते हैं बंगाली

यहां वर्षों पहले कुछ ही बंगाली थे लेकिन इनके यहां अपने क्षेत्र (पश्चिम बंगाल) से सीखने के आए लड़के अब खुद दुकान खोलकर धड़ल्ले से लोगों का इलाज कर रहे हैं। 

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vikram ahirwar

Jan 08, 2017

Ratlam News

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रतलाम। आदिवासी अंचल के बड़े गांव बाजना में बंगालियों के लिए तो जैसे सबसे अनुकूल जगह है। यहां हर गली और मोहल्ले में इनकी दुकानें आसानी से देखी जा सकती है। आश्चर्य की बात यह है कि यहां वर्षों पहले कुछ ही बंगाली थे लेकिन इनके यहां अपने क्षेत्र (पश्चिम बंगाल) से सीखने के आए लड़के अब खुद दुकान खोलकर धड़ल्ले से लोगों का इलाज कर रहे हैं। बाजना विकासखंड मुख्यालय के साथ ही जनपद मुख्यालय भी है। यहीं पर विकासखंड चिकित्सा अधिकारी का मुख्यालय हैं और इन्हें ज्यादातर समय यहीं रहना है।

दुकान बंद कर दूसरों को सूचना देने पहुंचा

बाजना के बीच बाजार में इलाज की दुकान चलाने वाला आरपी विश्वास यूं तो उम्र में महज 20-22 साल का है लेकिन जैसे ही पत्रिका टीम के आने की सूचना मिली तो दुकान छोड़कर दूसरे साथी को सूचना देने पहुंच गया। उसकी बदकिस्मती रही कि जिसे वह सूचना देने पहुंचा वहां पहले से ही टीम के सदस्य पहुंच चुके थे। यहां से यह उलटे पैर भाग खड़ा हुआ। पत्रिका टीम के पहुंचने से पहले कुछ मरीज इलाज के लिए आए हुए भी थे जिन्हें तुरंत भगा दिया कि बाद में इलाज के लिए आना।
बाजार में इसे रोककर पूछा तो यह महज 12वीं पास है और साइंस से बताता है। साइंस सब्जेक्ट में भी कौन से विषय से तो यह बता ही नहीं सका कि कौन-कौन से विषय लेकर उसने साइंस से 12वीं उत्तीर्ण की। कब से इलाज कर रहा है तो कहता है सालभर ऊपर हो गया है और यह काम उसने यहीं किसी दूसरे के यहां सीखा और अपनी दुकान चला रहा है।

इनसे मिलिए ये हैं पीसी धर

बाजना में गांव के अंतिम छोर में पीसी धर पिछले 20 सालों से दुकान चला रहे हैं। वे कितने पढ़े हैं यह 20 साल पहले का उन्हें पता नहीं है बस तब से इलाज कर रहे हैं। डिग्री क्या है कोई पता नहीं है। जब इनसे पूछा कि आप बिना डिग्री इलाज कैसे कर सकते हैं कोई मरीज मर जाय आया गंभीर हालत में हो जाए तो क्या करेंगे। उनका जवाब था बड़े डॉक्टर के पास भेज देंगे। कभी उनकी डिग्री की जांच हुई या कोई जांच करने आया तो वे बेबाकी से कहते हैं कि कोई नहीं आया न किसी ने डिग्री मांगी है। आप पहले हो जो इस तरह की बात कर रहे हो। इनकी इलाज की दुकान में बाहर कुछ ज्यादा सामान दिखाई नहीं देता लेकिन अंदर तीन-चार पलंग मरीजों के लिए आरक्षित किए हुए हैं। यहां चढ़ाई सलाइनें लटकी थी कि ये सलाइनें भी चढ़ाने में माहिर है।

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