रतलाम। ज्योतिषी अक्सर कुंडली में बिगडे राहु को शांत करने के लिए काल भैरव की पूजन का उपाय बताते है। मालवा के उज्जैन, रतलाम के कालिका माता मंदिर क्षेत्र व देश में ज्योर्तिलिंग काशी में काल भैरव का बड़ा मंदिर है। भैरव पूजन करने का अपना अलग प्रावधान है। ज्योतिषी आनंद त्रिवेदी के अनुसार रविवार व सोमवार के अलावा गुरुवार को काल भैरव की पूजन करने से विशेष लाभ मिलता हैं।
ज्योतिषी त्रिवेदी के अनुसार भगवान कालभैरव को भगवान शिव का रूप माना जाता है। इन्हें खुश करने के लिए भक्त कई तरह के जतन करते हैं। बहुत से समाज में भैरव को कुल देवता के रूप में माना जाता हैं। इन्हें पूजने की कई परम्परा हैं। जीवन में उन्नति चाहते है तो भैरव को प्रसन्न करने के लिए करें अनेक उपास बताए गए है।
पहले जाने कालभैरव की उत्पत्ति का राजमहादेव की क्रोधाग्नि का विग्रह रूप कहे जाने वाले कालभैरव का अवतरण मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ। इनकी पूजा से घर में नकारत्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत के अलावा पे्रम विवाह की बाधा, नौकरी की समस्या का समाधान आदि होता है। ज्योतिषी त्रिवेदी के अनुसार काल भैरव के प्राकट्य की निम्न कथा स्कंदपुराण के काशी- खंड के 31वें अध्याय में है।
कथा काल भैरव कीकथा के अनुसार एक बार देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी से पूछा कि जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है, तो स्वाभाविक ही उन्होंने अपने को श्रेष्ठ बताया। देवताओं ने वेदशास्त्रों से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है, अनादि अंनत और अविनाशी तो भगवान रूद्र ही हैं। वेद शास्त्रों से शिव के बारे में यह सब सुनकर ब्रह्मा ने अपने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहा। इससे वेद दुखी हुए। इसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो।
जब शिव को आया क्रोधअधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम रुद्र रखा है अत: तुम मेरी सेवा में आ जाओ। ब्रह्मा के इस आचरण पर शिव को भयानक क्रोध आया और उन्होंने भैरव को उत्पन्न करके कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। उन दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाख़ून से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवे सर को ही काट दिया। शिव के कहने पर भैरव काशी प्रस्थान किये जहां ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया।
कोतवाल के रूप में पूजे जातेआज भी ये काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। इनका दर्शन किये वगैर विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है। इतना ही नहीं, पूर्व जन्म के किए गए सभी प्रकार के अपराध से मुक्ति व नए जीवन की तरक्की काशी स्थित काल भैरव के दर्शन के बगैर संभव ब्राह्मणों में नहीं मानी जाती।
इस तरह प्रसन्न होते है भैरव - भैरव को प्रसन्न करने के लिए रोज सुबह सूर्योदय से पहले उठें। नहा-धोकर भैरव जी के दर्शन करने मंदिर जाएं और तेल का दीपक जलाएं। रोज ऐसा करने से भैरव बाबा प्रसन्न हो जाएंगे। वहीं जो आप चाहें वो पा सकेंगे।
-भैरव जी के मंदिर में इमरती व मदिरा का भोग लगाएं।
-रोज कपूर, तुलसी, नीम, सरसों के पत्ते को मिक्स करके सुबह-शाम घर में धूनी दें।
-भैरू मंदिर में उड़द व सिद्ध एकाक्षी श्रीफल मन्नत मांग कर चढ़ाएं।
-शुभ कार्य में देरी हो रही हो तो रविवार व गरुुवार के दिन भैरव जी के मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़ाएं और बटुक भैरव स्तोत्र या काल भैरव के अष्टकम का पाठ करें।