
नई दिल्ली। सप्तश्रृंगी देवी को ब्रह्मस्वरूपिणी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्म देवता के कमंडल से निकली गिरिजा महानदी देवी सप्तश्रृंगी का ही रूप हैं। सप्तश्रृंगी की महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती के त्रिगुण स्वरूप में भी आराधना की जाती है। कहते हैं कि जब भगवान राम, सीता और लक्ष्मण नासिक के तपोवन में पधारे थे तब वे इस देवी के द्वार पर भी आए थे।
कथा है कि किसी भक्त द्वारा मधुमक्खी का छत्ता तोड़ते समय उसे यह देवी की मूर्ति दिखाई दी थी। आपको बता दें पहाड़ों में बसी देवी की मूर्ति आठ फुट उंची है और अठारह भुजाओं वाली है। देवी सभी हाथों में शस्त्र लिए हुए हैं जो कि देवताओं ने महिषासुर राक्षस से लड़ने के लिए उन्हें प्रदान थे।
इन शस्त्रों में शंकरजी का त्रिशूल, वरुण का शंख, विष्णु का चक्र, वायु का धनुष-बाण, अग्नि का दाहकत्व, इंद्र का वज्र व घंटा, दक्ष प्रजापति की स्फटिकमाला, यम का दंड, ब्रह्मदेव का कमंडल, सूर्य की किरणें, कालस्वरूपी देवी की तलवार, क्षीरसागर का हार, कुंडल व कड़ा, विश्वकर्मा का तीक्ष्ण परशु व कवच, समुद्र का कमलाहार, हिमालय का सिंहवाहन व रत्न शामिल हैं। प्रतिमा सिंदुरी होने के साथ ही रक्तवर्ण है जिसकी आंखें तेजस्वी हैं।
मुख्य मंदिर तक जाने के लिए करीब 472 सीढि़यां चढ़नी पड़ती हैं। चैत्र और अश्विन नवरात्र में यहाँ उत्सव होते हैं। कहते हैं कि चैत्र में देवी का रूप हँसते हुए तो नवरात्र में गंभीर नजर आता है। इस पर्वत पर पानी के 108 कुंड हैं, जो इस स्थान की सुंदरता को कई गुना बड़ा देते हैं। यह मंदिर छोटे-बड़े सात पर्वतों से घिरा हुआ है इसलिए यहां की देवी को सप्तश्रृंगी यानी सात पर्वतों की देवी कहा जाता है।
सप्तश्रृंगी देवी के दर्शन के लिए जाने के लिए सबसे नजदीक मुंबई या पुणे से हवाई रास्ता है जहां से बस या निजी वाहन से नासिक पहुंचा जा सकता है। सभी मुख्य शहरों से नासिक के लिए आसानी से रेल उपलब्ध है। यहां सड़क मार्ग से भी जाया जा सकता है सप्तश्रृंगी पर्वत नासिक से 65 किमी की दूरी पर स्थित है जहां पहुंचने के लिए महाराष्ट्र परिवहन निगम के साथ निजी वाहन भी आसानी से उपलब्ध हैं।
त्योहारों और प्रार्थना
आपको बता दें हर पूर्णिमा के दिन और नवरात्रि के दौरान मंदिर में भीड़ होती है। देवी को नारियल और साड़ियों की पेशकश की जाती है। लोग देवी से उनकी इच्छाओं को पूरा करने का आशीष लेते है। इसलिए इस जगह साल भर भक्तों की यात्रा होती है। चैत्रोत्सव का सबसे बड़ा त्योहार राम नवमी के दौरान होता है। भक्त अक्सर पूरे पहाड़ी की प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करते देखा जा सकता है। इस के अलावा अन्य त्योहार दशहरा, गुड़ी पड़वा, गोकुलाष्टमी और कोजागिरी हैं। कुछ समुदाय अपने परिवार में एक नए जन्म के बाद देवी की पूजा करते हैं। एक अन्य प्रमुख उत्सव गोंधळ है। यह एक तुन्तुना के उपयोग के साथ गोंधळी समुदायों द्वारा किया जाने वाला पारंपरिक नृत्य है। छोटे ड्रम और झांझरो का भी उपयोग किया जाता है। गोंधळ को शादी, जन्म और अन्य प्रमुख घटनाओं के दौरान किया जाता है।
Published on:
21 Feb 2018 08:42 am
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