18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

गायत्री-1

गायत्री हमें ज्ञान, प्रकाश और ऊर्जा की इस महासत्ता से जोड़ती है। वह हमें ‘भू:’ से आरम्भ करके ‘भर्गोदेव’ की ओर ले जाती है

3 min read
Google source verification

image

Gulab Kothari

Oct 01, 2017

Rudra Gayatri Mantra

Rudra Gayatri Mantra

सूर्य से पहले जो प्रकाश दिखाई देता है वह उषा है। प्रकाश जब अंधकार को तोडक़र बाहर आता है तो एक बिंदु पर पहले बारहवां आदित्य प्रकाशित होता है। फिर ग्यारहवां, दसवां... अंत में सूर्य उस पिंड से गुजरता है। उस बिंदु का तापमान क्रमश: बढ़ता है और आद्र्रता घटती जाती है। इस क्रम में गायत्री के पांच मुंह और पचरंगा प्रकाश दिखाई देता है। सूर्योदय के बाद प्रकाश जब सीधा पृथ्वी पर आने लगता है तब इसे सावित्री कहते हैं।

मेरे गुरु श्रद्धेय देवीदत्त चतुर्वेदी ने गायत्री मन्त्र के भाष्य में उषा काल और गायत्री के संबंध का उल्लेख किया है-

वैदिक विज्ञान के अनुसार हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं वह एक सौर मण्डल का भाग है। उसमें सूर्य, चन्द्र और अन्य ग्रह हंै। ऐसे अनेक सूर्य मण्डल हैं। यह बहुत सारे सूर्य मिलकर जिस अभिजित तारे से शक्ति प्राप्त करते हैं वह ब्रह्मा है। सभी सूर्यों को साथ लिए ब्रह्मा जिस ज्ञानमय ज्योति वाले महासूर्य से शक्ति और प्रकाश पाता है वह है ज्योतिषांज्योति, सभी आकाशों को प्रकाश देने वाला। उस परम ज्योति की रश्मियां एक सूत्र से आकर हमारे शरीर में और ब्रह्माण्ड के कण-कण में ओत-प्रोत होती हैं।

परम तत्त्व की ओर
गायत्री हमें ज्ञान, प्रकाश और ऊर्जा की इस महासत्ता से जोड़ती है। वह हमें ‘भू:’ से आरम्भ करके ‘भर्गोदेव’ की ओर ले जाती है और हमारी बुद्धि को त्रिगुण के भंवर से निकाल कर उस परम तत्त्व की ओर प्रेरित करती है जिससे लगातार अमृत वर्षा होती रहती है।

‘ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात्’

ॐ : गायत्री का क्रम ॐ से आरम्भ होता है ॐ के ऋषि ब्रह्मा हैं। ॐ का अकार, उकार, मकारात्मक स्वरूप है।
भू: : वास्तविक आरम्भ भू: भुव: स्व: मह: जन: तप: सत्यम् से है। सत्यम् से भू: तक की स्थिति एक सूत्र से बंधी है। हमारी दृष्टि सत्यम् पर नहीं जा सकती। सामने की भू: को हम समझ सकते हैं इसलिए भू: से ही इसका आरम्भ करते हैं। देवताओं की गणना में सबसे पहले अग्नि है और अन्त में तैंतीसवें विष्णु हैं। अग्नि का सम्बन्ध भू: से ही है और इसी अग्नि की सारी व्याप्ति हो रही है इसलिए प्रथम दृष्टि भू: पर ही जानी चाहिए।

भुव: : पहले पंच महाभूतों से किस रूप में पृथ्वी बन रही है-उसका सारा श्रेय भुव: को होता है। भुव: नाम अन्तरिक्ष है सोममय समुद्र से भरा हुआ है। अनवरत सोम की वृष्टि वहां से पृथ्वी पर होती रहती है किन्तु अकेले सोम की वृष्टि नहीं है। भू: भुव: स्व: ये तीनों सूत्र जुड़े हुए हैं। स्व: में आदित्य है। वहां अमृत और मृत्यु दोनों तत्त्व मौजूद हैं।

अमृत और मृत्यु
आदित्य का ऊध्र्व भाग बारह मण्डलों में विभक्त है। बारहवें मण्डल पर विष्णु विराजमान है। जो आदित्य मण्डल का ऊपरी अर्ध भाग है उसकी विवेचना वेद में अमृत रूप में आई है। नीचे का अर्ध भाग जो पृथ्वी से जुड़ा आ रहा है वह मृत्युमय है।

मृत्यु में अमृत का आधान हो रहा है। इस तरह से अमृत मृत्यु दोनों से जुड़ा हुआ तत्त्व जो सोम रूप बनकर पृथ्वी पर उतर रहा है उसका बीच में अन्तरिक्ष ही सारा समुद्र-घर बना हुआ है। इस अन्तरिक्ष में हमारी पृथ्वी के जैसे अनन्त लोक विराजमान हैं। ये लोक सूर्य की ज्योति से ढके रहते हैं और सूर्यास्त के बाद तारों के रूप में खिल पड़ते हैं। भुव: के अन्तरिक्ष से सतत् अमृत-मृत्युमय तत्त्व पाॢथव अग्नि में सम्मिश्रित हो रहा है। प्रकृति का यज्ञमय संगतिकरण चलता रहता है। उसी से पार्थिव अग्नि की जागृति होती है।

स्व: भू: से चला हुआ अग्नि भुव: को पार करके स्व: में जा रहा है। स्व: को संस्कृत में स्वर्ग वाची बताया गया है। स्व: प्रत्यक्ष पिण्ड है। आदित्य है। सूर्य के साथ हजारों, सर्प-पक्षीगण, असुर-देवगण उदित हो रहे हैं। सभी का क्रियामय कर्म चलता रहता है। इधर अमृतभाव भी आ रहा है उधर विषभाव भी आ रहा है। सम्मिश्रित होकर पृथ्वी तक आ रहे हैं और यहां नीचे समुद्र में उनका मन्थन हो रहा है। मन्थन से किनारे पर जो पंक(कीचड़) आ रहा है,उसमें वायु बन्द होकर बुद्बुद करता है। कीचड़ सूख कर पृथ्वी का रूप लेता जा रहा है।

गायत्री मन्त्र में स्व: से आगे के व्याहृतियों के नाम नहीं लेते जबकि ये तो सात हैं। आगे की व्याहृतियों मह:, तप: और सत्यम् का स्वरूप स्पष्टीकरण नहीं होता।

‘तत्’: तत् शब्द को सम्बन्धपरक माना गया है। भू: भुव: स्व:, किसी तत् यानी स्व: से ऊपर का विचार हो रहा है।

स्व: जितना भी है, वेद-विज्ञान के विचार के अनुसार जैसे हम हैं वैसे स्व: है। यहां पर जो अवधि सौ वर्ष की है वहां वही अवधि काल क्रम से हजार वर्ष की है। यद्यपि पुरुष मात्र शतायु होता है, देवता भी शतायु ही है किन्तु उनके सौ वर्ष हमारे हजार वर्ष होते हैं। स्व: की इस तरह की विवेचना पुराणों में खूब आती है लेकिन महाप्रलय में स्व: की भी समाप्ति तो हो ही जाती है। जन: नाम के परमेष्ठी मण्डल से स्व: का उदय हुआ, उसमें ही लीन होना बताया गया। अत: स्व: भी चिरस्थायी नहीं है।