
नई दिल्ली।मंदिर में हम सभी पूजा करने के लिए जाते हैं ताकि भगवान का आर्शीवाद हमें मिल पाएं लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जहां श्रद्धालू जाते तो हैं लेकिन पूजा नहीं करते। भला ये कौन सी बात हुई कि मंदिर में पूजा ही नहीं किया जाता है।
ये मंदिर उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 70 किलोमीटर दूरी पर स्थित एक कस्बा है जिसका नाम है थल वहां से छह किलोमीटर दूर बल्तिर नामक गांव में है।
इस मंदिर का नाम हथिया देवाल है। इस मंदिर में दर्शन के लिए भक्तों का आना जाना तो लगा रहता है लेकिन यहां पूजा कोई नहीं करता क्योंकि भगवान शिव के इस मंदिर को अभिशप्त माना जाता है और लोगों में ऐसी मान्यता है कि जो कोई भी यहां पूजा करेगा, उसके लिए ये फलदायक नहीं होगा बल्कि इस अभिशप्त मूर्ति का पूजन उनके लिए अनिष्टकारक भी हो सकता है और बस इसी डर से इस मंदिर के दर्शन के लिए आने वाले भक्त मंदिर की चौखट को नहीं लांघते हैं। यहां लोग कहते हैं कि ये मंदिर एक हाथ से निर्मित है।
एक समय यहां पर कत्यूरी नामक एक राजा का शासन था। उस राजा को स्थापत्य कला में बेहद ही रूचि थी और उसकी चाहत हमेशा से यही थी कि इस मामले में वो बाकी राजाओं की तुलना में हमेशा आगे रहें और अपने इसी शौक के चलते उस राजा ने एक कुशल कारीगर से मंदिर को बनाने को कहा और एक रात के अंदर ही उसे तैयार करने क ो कहा। इस कारीगर ने केवल एक हाथ से रातों रात उस मंदिर को बना डाला लेकिन राजा को डर इस बात का था कि कोई और इस तरह के मंदिर का निर्माण न कर पाएं और इस चक्कर में उसने उस कारीगर का एक हाथ कटवा दिया।
इस घटना के बाद वो मूर्तिकार कहीं गायब हो गया और बहुत ढूंढने के बाद भी नहीं मिला। बाद में जब पंडितों ने मंदिर में स्थापित शिवलिंग को देखा तो पाया किउस शिवलिंग का अरघा उल्टी दिशा में बना हुआ है हालांकि उसे सही दिशा में करने का बहुत प्रयास किया गया पर वो वैसा ही रहा। इस पर पंडितो ने कहा कि जो कोई भी इस शिवलिंग की पूजा करेगा, उसके लिए ये पूजा लाभदायक नहीं होगी।
उसी दिन के बाद से आज तक इस शिवालय की पूजा नहीं की जाती है हालांकि मंदिर में आने वाले लोग यहां के दीवारों पर की गई चित्रकारी को निहारते है लेकिन पूजा से तो दूरी ही सही।
Published on:
12 Feb 2018 01:49 pm
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