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महाशिवरात्रि पर चारों पहर की पूजा मानी जाती है बेहद फलदायी, जानिए इसकी विधि और मुहूर्त

द्वितीय पहर की पूजा में भक्तों को भगवान भोलेनाथ को दही अर्पित करके जल से उनका अभिषेक करना चाहिए। ध्यान रखें कि इस पूजा में "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करना न भूलें। द्वितीय पहर की पूज करने से भक्तों के अर्थ यानी धन संबंधी कार्य सिद्ध होते हैं।

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महाशिवरात्रि पर चारों पहर की पूजा मानी जाती है बेहद फलदायी, जानिए इसकी विधि और मुहूर्त

आखिर क्यों है चार पहर की पूजा का खास महत्व-

महाशिवरात्रि का पर्व हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस पावन दिन ही भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। भोलेनाथ के भक्तों के लिए इस दिन का विशेष महत्व होता है। इस दिन सच्चे मन और पूरे विधि-विधान से की गई पूजा बहुत फलती है। और आदियोगी प्रसन्न होकर अपने भक्तों को हर कष्ट से मुक्त कर देते हैं। यूं तो महाशिवरात्रि के अवसर पर सुबह से लेकर शाम तक महादेव की पूजा और दर्शन के लिए मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन शिवपुराण के अनुसार माना गया है कि महाशिवरात्रि के दिन रात्रि पूजन का विशेष होता है। इसी वजह से भक्तजन यदि चारों पहर यानी संध्याकाल से लेकर अगले दिन ब्रह्ममुहूर्त तक भोलेनाथ की पूजा करें तो उन्हें शिवशंभु का खास आशीर्वाद प्राप्त होता है। मान्यता है कि ये चारों पहर की पूजा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सभी को सिद्ध करने वाली होती है। तो आइए विस्तार से जानते हैं चारों पहर की पूजा की विधि और मुहूर्त के बारे में...

प्रथम पहर की पूजा-
महाशिवरात्रि के दिन प्रथम पहर की पूजा संध्याकाल से शुरू की जाती है। प्रथम पहर की पूजा संध्या के 6 बजे से लेकर रात 9 बजे तक की जाती है। यही इस पूजा के लिए उत्तम समय होता है। इस पहर की पूजा करते वक्त भक्तों को शिवलिंग पर दूध अर्पित करना चाहिए। साथ ही शिव मन्त्र "ॐ नमः शिवाय" अथवा शिव स्तुति का पाठ अवश्य करें। इस पहर की पूजा आपके धर्म को सिद्ध करती है।

द्वितीय पहर की पूजा-
दूसरे पहर की पूजा रात 9 बजे से प्रारंभ होकर मध्यरात्रि 12 बजे तक चलती है। द्वितीय पहर की पूजा में भक्तों को भगवान भोलेनाथ को दही अर्पित करके जल से उनका अभिषेक करना चाहिए। ध्यान रखें कि इस पूजा में "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करना न भूलें। द्वितीय पहर की पूज करने से भक्तों के अर्थ यानी धन संबंधी कार्य सिद्ध होते हैं।

तृतीय पहर की पूजा-
शिवपुराण में तृतीय पहर की पूजा का समय मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर 3 बजे तक बताया गया है। साथ ही पूजा के समय आदियोगी का गाय के घी से तिलक कर जलाभिषेक करने का विशेष विधान है। तृतीय पहर में शिवशंकर का ध्यान करने और शिव स्तुति का पाठ करने से आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता है। वहीं इस पहर में शिव पूजन करने से कामेच्छा से मुक्ति मिलती है।

चतुर्थ पहर की पूजा-
चौथे यानी अंतिम पहर की पूजा ब्रह्ममुहूर्त में की जाती है। इस पूजा का समय विद्वानों के अनुसार 3 बजे से सुबह 6 बजे तक बताया गया है। इस ब्रह्ममुहूर्त में शिवशम्भु का ध्यान करने से आपका भविष्य उज्जवल बनता है और व्यक्ति भवसागर से तर जाता है। चौथे पहर की पूजा में आपको शिवलिंग पर शहद लगाने के बाद भोलेनाथ का जलाभिषेक करना चाहिए। साथ ही पूजा में शिव स्तुति का पाठ और शिव मन्त्र "ॐ नमः शिवाय" का जाप करने से मोक्ष कि प्राप्ति होती है।

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