
परिवर्तनी एकादशी 2023
कब है परिवर्तनी एकादशी
पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि की शुरुआत सोमवार 25 सितंबर सुबह 11.25 बजे होगी और यह तिथि 26 सितंबर मंगलवार सुबह 8.30 बजे संपन्न हो रही है। इसका व्रत सोमवार को रखा जाएगा और पारण मंगलवार 27 सितंबर को दोपहर 1.41 बजे से 3.32 बजे के बीच होगा।
पार्श्व एकादशी पर योग
पार्श्व एकादशी व्रत दो शुभ योगों में रखा जाएगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग दोपहर 03:25 बजे से अगले दिन 26 सितंबर को सुबह 05:54 बजे तक है। वहीं इस दिन रवि योग सुबह 5.53 बजे से दोपहर 3.25 बजे तक रहेगा।
क्यों कहते हैं जल झूलनी एकादशी
मान्यता है भाद्रपद महीने की अष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पहली बार माता यशोदा ने जलाशय जाकर भगवान कृष्ण के वस्त्र धोए थे। इसीलिए इस तिथि को जल झूलनी एकादशी के नाम से जाना जाता है।
परिवर्तनी एकादशी का महत्व
धर्म ग्रंथों के अनुसार परिवर्तनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा की जाती है। पद्मा एकादशी व्रत से व्यक्ति के सुख, सौभाग्य में वृद्धि होती है। इस दिन मंदिरों में भगवान श्री विष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम को शोभायात्रा निकाली जाती है। भक्त भगवान को पालकी में बिठाकर पूजा-अर्चना के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ शोभा यात्रा के रूप में नगर भ्रमण कराते हैं फिर मंदिर लेकर आते हैं, जिसे देखने के लिए भीड़ उमड़ती है।
धर्म ग्रंथों के अनुसार परिवर्तनी एकादशी व्रत से साधक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वाजपेय यज्ञ करने का फल मिलता है। यह भी मान्यता है कि परिवर्तनी एकादशी पर भगवान वामन की पूजा तीनों लोक और तीनों देव की पूजा का फल देता है। यह भी कहा जाता है कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन शेषशैय्या पर करवट बदल रहे भगवान पद्मनाभ प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं, इससे इस समय कोई भक्त विनय और भक्ति पूर्णव कुछ मांगता है तो वे जरूर प्रदान करते हैं। इसलिए एकादशी पूजा विशेष फलदायक होती है।
परिवर्तिनी एकादशी पूजा विधि
1. परिवर्तनी एकादशी व्रत की तैयारी भी एक दिन पहले शुरू कर लेनी चाहिए। दशमी के दिन दूसरी मीटिंग से ही सात्विक आहार या ब्रह्मचर्य का पालन शुरू कर देना चाहिए।
2. परिवर्तनी एकादशी के दिन सुबह स्नान ध्यान कर मंदिर की साफ सफाई करें और व्रत का संकल्प लें।
3. इसके बाद भगवान विष्णु के वामन अवतार का ध्यान कर उन्हें एक चौकी पर विराजमान कर पीला साफ वस्त्र बिछाएं भगवान को आसन दें और पचांमृत (दही, दूध, घी, शक्कर, शहद) से स्नान कराएं।
4. इसके बाद गंगा जल से स्नान करा कर भगवान वामन को कुमकुम-अक्षत लगाएं और धूप दीप जलाएं।
5. नैवेद्य चढ़ाएं और तुलसी की माला से ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें और भगवान की आरती उतारें।
6. भगवान वामन की कथा सुनें यां पढ़ें और प्रसाद बांटे।
7. शाम को भगवान विष्णु के मंदिर में या उनकी मूर्ति के सामने भजन-कीर्तन करें और भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा करें।
8. हल्का फलाहार करें और रात्रि जागरण करते हुए भगवान का ध्यान करें।
9. अगले दिन गरीब या ब्राह्णण को भोजन कराएं, उन्हें दक्षिणा देकर पारण करें।
Published on:
24 Sept 2023 05:58 pm

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