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रीवा में भगवान राम के नाम पर 330 साल चला शासन, अब भी गद्दी पर उन्हीं का आसन

- 403 साल से राजघराने द्वारा आराध्य मानकर की जा रही पूजा, दशहरे पर रावण वध के लिए निकलता है चल समारोह

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रीवा

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Mrigendra Singh

Aug 05, 2020

rewa

330 years rule in the name of Lord Ram in Rewa, Baghel's Dynasty


रीवा। अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर का भूमिपूजन पांच अगस्त को होने जा रहा है। इस समय पर पूरा देश राममय हो चला है। ऐसे में उस राजशाही की चर्चा भी आवश्यक होती है जिसने भगवान श्रीराम को 36 पीढिय़ों से लगातार आराध्य माना है। बाघेल राजवंश ने सन 1617 में रीवा को अपनी राजधानी बनाई। तत्कालीन महाराजा विक्रमादित्य सिंह जूदेव ने राजसिंहासन पर स्वयं बैठने के बजाय भगवान श्रीराम को राजाधिराज के रूप में स्थापित किया। राजगद्दी श्रीराम के नाम कर वे प्रशासक के रूप में काम करते रहे। बाघेलवंश के वे 22वें महाराजा थे। इसके बाद से देश आजाद होने तक अन्य पीढिय़ों के महाराजाओं ने भी उसी परंपरा को कायम रखा।

- लक्ष्मण जी के हिस्से में आया था राज्य
रीवा के महाराजाओं द्वारा राजसिंहासन पर नहीं बैठने के पीछे जो कथा प्रचलन में है उस पर महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चेरिटेबल ट्रस्ट की सीइओ अल्का तिवारी बताती हंै कि विंध्य का जो हिस्सा है इसे भगवान श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी को सौंपा था। अपने शासनकाल में कभी लक्ष्मण भी राजसिंहासन पर नहीं बैठे। वह भी बतौर प्रशासक राज्य का संचालन करते रहे। 13वीं शताब्दी में बाघेल राजवंश ने बांधवगढ़ में राजधानी बनाई तो वहां पर भी गद्दी पर कोई महाराजा नहीं बैठे। यह प्रक्रिया सन 1617 में रीवा को राजधानी बनाए जाने के बाद से लगातार चल रही है।


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तीन रूपों में राजाधिराज की पूजा
राजघराने की गद्दी पर राजाधिराज की तीन रूपों में पूजा की जाती है। एक भगवान विष्णु, दूसरा भगवान श्रीराम और सीता, तीसरा श्रीराम-लक्ष्मण-सीता की पूजा की जाती है। रीवा राजघराने द्वारा यह पूजा 403 वर्षों से अब तक की जा रही है। राजघराने के प्रमुख पुष्पराज सिंह एवं उनके विधायक पुत्र दिव्यराज सिंह अब पूजा कर रहे हैं। हर साल दशहरे के दिन राजधिराज की गद्दी पूजन के बाद चल समारोह शहर में निकलता है। रावणवध स्थल तक यह यात्रा जाती है। कहा जाता है कि मैसूर और रीवा दो ही स्थानों का दशहरा पहले चर्चित था, जिसे देखने दूसरे राज्य से लोग पहुंचते थे।
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Mrigendra Singh Rewa IMAGE CREDIT: patrika


धार्मिक आयोजनों के लिए लक्ष्मणबाग की स्थापना
रीवा को राजधानी बनाने के बाद सन 1618 में लक्ष्मणबाग का कार्य भी प्रारंभ कर दिया गया था। यहां पर पूजा पाठ के लिए चारोंधाम के देवताओं के मंदिर बनाए गए। कहा जाता है कि भगवान श्रीराम के छोटेभाई लक्ष्मण के हिस्से में यह राज्य मिला था, इसलिए लक्ष्मण की भी यहां पूजा होती रही है। उनके प्रति आस्था प्रकट करने के लिए ही लक्ष्मणबाग का निर्माण कराया गया। जहां पर सभी प्रमुख देवताओं के मंदिर स्थापित किए गए। वर्तमान में यह कलेक्टर की अध्यक्षता वाले ट्रस्ट की देखरेख में संचालित हो रहा है।
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