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बाघों की पसंद वाले जंगल में आखिर क्यों हो रही मौतें, रहस्य जानना चाहते हैं लोग

- सप्ताह भर के भीतर दूसरे बड़े बाघ की मौत, नकुल का पोस्टमार्टम कराने के बाद किया गया अंतिम संस्कार- बंगाल टाइगर का बाड़ा पर्यटकों के लिए बंद

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रीवा

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Mrigendra Singh

Jan 02, 2021

rewa

mukundpur zoo and white tiger safari , tiger death in mukundpur zoo


रीवा। महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव चिडिय़ाघर मुकुंदपुर में धीरे-धीरे बाघों की संख्या घटती जा रही है। अब एक और बाघ नकुल की मौत हो गई है। जिसके चलते यहां पर जानवरों के रखरखाव को लेकर की गई व्यवस्थाओं पर सवाल उठने लगे हैं। करीब सप्ताह भर के अंतराल में चिडिय़ाघर के दूसरे बड़े बाघ की मौत हो गई है। चिडिय़ाघर परिसर में ही प्रदेश स्तर का रेस्क्यू सेंटर खोला गया है, जहां पर दूसरे हिस्सों से घायल और बीमार बाघों और जानवरों को लाया जाता है। लेकिन यहां पर चिडिय़ाघर के ही बाघों को प्रबंधन नहीं बचा पा रहा है। अब औरंगाबाद से लाए गए बंगाल टाइगर नकुल की भी मौत हो गई है। चिडिय़ाघर का यह सबसे बड़ा बाघ था। इसके साथ लाई गई बाघिन दुर्गा की मौत पहले ही हो चुकी है। अब बंगाल टाइगर का बाड़ा खाली हो गया है। यह पर्यटकों के लिए बंद किया जाएगा। करीब सप्ताह भर पहले ही सफेद बाघ गोपी की मौत ने भी प्रबंधन को बड़ा झटका दिया था, इसके बावजूद सीख नहीं ली गई और एक और बाघ की मौत हो गई। नकुल कई दिनों से आंशिक रूप से बीमार चल रहा था। वह बाड़े में चहल कदमी जरूर करता था लेकिन पहले की तरह उसकी दहाड़ सुनाई नहीं दे रही थी, इसके बावजूद प्रबंधन ने गंभीरता से नहीं लिया।

- रूटीन जांच नहीं होने की वजह से बीमारी नहीं जान पाते
करीब एक वर्ष के अंतराल में आधा दर्जन से अधिक की संख्या में बाघों की मौत ने बड़े सवाल खड़े किए हैं। ह्वाइट टाइगर सफारी में एक सफेद बाघ और बाघिन को रखा गया है। साथ ही आधा दर्जन से अधिक बाड़ों में रखे जाते हैं। इनका रूटीन स्वास्थ्य परीक्षण नहीं होने की वजह से अचानक मौतें हो रही हैं और उसके बावजूद प्रबंधन कोई गंभीरता नहीं दिखा रहा है। बताया जा रहा है कि जितने बाघों की मौतें हुई हैं वह पहले से ही बीमार होने लगे थे, समय पर उपचार देकर उन्हें बचाया जा सकता था।


- सुपरवीजन करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी सवालों में
मुकुंदपुर का चिडिय़ाघर वन विभाग का प्रदेश में अकेला चिडिय़ाघर और ह्वाइट टाइगर सफारी है। यहां वन विभाग के अधिकारियों का नियंत्रण है। चिडिय़ाघर में संचालक की नियुक्ति तो की गई है साथ ही सतना डीएफओ और रीवा के सीसीएफ की भी जिम्मेदारी सुपरवीजन की है। ये अधिकारी अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पा रहे। अब बाघ की मौत के बाद चिडिय़ाघर प्रबंधन के साथ अन्य अधिकारियों ने चुप्पी साध ली है।

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- साल भर में पांच बड़ी मौतें, दो अब भी बीमार
बाघों की पांच बड़ी मौतें साल भर के भीतर चिडिय़ाघर में हो चुकी हैं। जिसमें २२ अप्रेल को औरंगाबाद से लाई गई बाघिन दुर्गा, १६ मई को बांधवगढ़ से आए बंधु, १९ जून की मादा लायन देविका, २३ दिसंबर को सफेद बाघ गोपी की मौत हो चुकी है। अब नकुल की भी मौत हो गई है। वहीं रेस्क्यू कर लाए गए तीन तेंदुओं को भी नहीं बचाया जा सका। जानकारी मिली है कि सफेद बाघिन सोनम की हालत भी ठीक नहीं है। साथ ही सफारी की सफेद बाघिन विंध्या भी कमजोर हो गई है।
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एक्सपर्ट व्यू---


सफारी और चिडिय़ाघर के जानवरों की रूटीन जांच तीन से चार महीने में होते रहना चाहिए। साथ ही यदि किसी की एक्टिविटी बदली है तो उसकी भी तत्काल जांच होना चाहिए। इससे कोई बीमारी होने से पहले ही उपचार दिया जा सकता है। बाघों के मामले में विशेष संवेदनशीलता बरते जाने की जरूरत होती है। मुकुंदपुर चिडिय़ाघर में यदि लगातार मौतें हो रही हैं तो इस पर अनुसंधान करने की जरूरत है।
डॉ. जीपी त्रिपाठी, जानवरों के चिकित्सक

Mrigendra Singh IMAGE CREDIT: patrika


- रेस्क्यू सेंटर में पैथालॉजी लैब तक शुरू नहीं हो पाई
चिडिय़ाघर में शासन ने एक प्रदेश स्तर का रेस्क्यू सेंटर स्वीकृत किया है। जिसमें रीवा, शहडोल संभाग के साथ ही जबलपुर, कटनी, बांधवगढ़, सिवनी, मंडला आदि क्षेत्रों से बाघों एवं तेंदुओं को उपचार के लिए लाया गया था। इस रेस्क्यू सेंटर में पैथालॉजी लैब तक शुरू नहीं हो पाई है। जिसकी वजह से जानवरों के ब्लड, यूरिन एवं अन्य सेंपल की जांच के लिए रीवा के वेटरनरी कालेज और जबलपुर के विश्वविद्यालय को भेजना पड़ता है। जहां से करीब दस से 15 दिन रिपोर्ट आने में लग जाते हैं। इसके बाद भी अब तक व्यवस्थाएं नहीं बनाई जा सकी हैं।

- नेता-अफसरों के मनोरंजन का केन्द्र बनता जा रहा
मुकुंदपुर का जू एण्ड सफारी बीते कुछ समय से जानवरों की सुरक्षा करने और संख्या बढ़ाने पर ध्यान नहीं दे रहा है। प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों का फोकस नेताओं और अफसरों के साथ ही उनके करीबियों को भ्रमण कराने में ही रहता है। जिसके चलते आवश्यकता के अनुरूप व्यवस्थाएं देने में वह सफल नहीं हो पा रहे हैं। बताया जा रहा है कि अधिकांश केयर टेकरों की नियुक्ति भी सिफारिश के आधार पर हुई है।

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