
arthritis treatment
सागर. प्रति वर्ष 12 अक्टूबर को मनाए जाने वाले वल्र्ड आर्थराइटिस डे की इस बार थीम है ‘डोंट डिले, कनेक्ट टुडे’। आम भाषा में गठिया कही जाने वाली जोड़ों की इस बीमारी का बिना देर किए इलाज जरूरी है। बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारियों में सबसे कॉमन आर्थराइटिस की प्रमुख वजहों में अनियमित दिनचर्चा को शामिल किया जा सकता है। यह बीमारी युवाओं को भी होने लगी है। ऐसे में लाइफ स्टाइल को सुधारकर, नियमित कर शरीर के जोड़ों को ताउम्र बेजोड़ बनाया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार आर्थराइटिस से पीडि़त युवाओं की संख्या बढ़ रही है। हैरानी है कि इस बीमारी में उम्र के अब कोई मायने नहीं रह गए हैं। सिविल सर्जन और हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुण सराफ बताते हैं पहले 55 और 60 वर्ष की उम्र में आर्थराइटिस होता था। अब 30 से 35 वर्ष के युवाओं को भी यह बीमारी हो रही है। बीएससी में 60 फीसदी मरीज रोजाना आर्थराइटिस के आ रहे हैं।
लापरवाही पड़ती है भारी
हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. जीएस चौबे ने बताया कि महिलाओं में यह बीमारी ज्यादा पाई जाती है। आमतौर पर शुरुआत घुटनों में हल्के दर्द से होती है। तब लोग नजरअंदाज करते हैं और पेनकिलर लेते हैं। बाद में डॉक्टर को दिखाते हैं। डॉ. चौबे ने बताया कि जागरूकता से आर्थराइटिस की समस्या घट रही है, लेकिन समय रहते विशेषज्ञ डॉक्टर के परामर्श से सर्जरी आदि की नौबत ही नहीं आएगी।
ऐसे पहचानें
घुटनों में सात दिन लगातार दर्द होना
जोड़ों के दर्द के साथ बुखार आना
बैक्टीरिया और वायरस से जन्मा जोड़ का दर्द
जोड़ से फ्लूड निकलना
परेशानियां
सूजन या लगातार दर्द होना
चलना-फिरना या सीढिय़ां चढऩे-उतरने में मुश्किल
नीचे बैठने या बैठकर उठने में दिक्कत
पालथी लगाकर बैठना मुमकिन नहीं
इंडियन टॉयलेट यूज नहीं कर पाना
पैरों की शेप और चाल बिगड़ जाना
ऐसी जीवनशैली से लें सीख
साइकिल- साइकिल चलाने से घुटनों की सबसे अच्छी एक्सरसाइज होती है। ५० वर्ष पहले तक लगभग सभी लोग साइकिल चलाते थे। यही वजह है कि घुटने सही रहते हैं।
तैरना और मार्निंग वॉक- घूमने और तैरने से रक्त संचार बढ़ता था। पहले लोग मार्निंग वॉक करते थे, अब युवा सोना पसंद करते हैं, इसलिए ऑर्थराइटिस बढ़ रहा है।
अंकुरित खाना और गुड़- सुबह से अंकुरित आहार लेने से पर्याप्त प्रोटीन मिलता है। गुड़ से खून की कमी नहीं होती।
पालथी लगाकर भोजन- पालथी लगाकर भोजन करने से डाइजेशन सही रहता है। हाथ से भोजन करने से अंगुलियों का मूवमेंट होता है।
धूप- हड्डियों और मांसपेशियों की मजबूती के लिए विटामिन डी धूप से मिलता है। मतलब वर्ष में 40 दिन 40-४० मिनट के लिए धूप में बैठें। इस दौरान शरीर पर कपड़े कम हों।
मिट्टी में खेल- बच्चों को धूप और मिट्टी में खेलने दें। इससे इम्युनिटी बढ़ती है। विटामिन डी भी मिलता है।
सर्जरी की जरूरत कब?
दवाओं और फिजियोथैरेपी से फायदा न होने पर मरीज को आखिरकार ऑर्थोपीडिक सर्जन का सहारा लेना पड़ता है। ऑर्थोपीडिक सर्जन एक्स-रे या एमआरआई से जांच के बाद इलाज की दिशा तय करता है। अगर घुटनों की हड्डियां आपस में रगड़ खाने से बहुत क्षतिग्रस्त नहीं हुई हैं या टांगों की शेप खराब नहीं हुई है तो घुटने में इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इंजेक्शन दो तरह के होते हैं- विस्कोसप्लिमेंटेशन और लोकल स्टेरॉयड। अगर घुटनों का कार्टिलेज खत्म होने के कारण हड्डियां आपस में रगड़ खाकर घिस रही हैं, मरीज के लिए चलना-फिरना, उठना-बैठना मुश्किल हो गया है तो सर्जरी जरूरी हो जाती है।
सर्जरी दो तरह की होती हैं- माइनर (ऑर्थोस्कोपी) और मेजर (नी रिप्लेसमेंट)। माइनर सर्जरी लेप्रोस्कोपिक होती है और परमानेंट नहीं होती। इसमें जोड़ों की सफाई की जाती है या मांस फटने जैसी समस्या हल की जाती है। मरीज 24 घंटे या एक ही दिन में घर जा सकता है। सरकारी अस्पतालों में यह नि:शुल्क और प्राइवेट में इसकी कीमत 60-80 हजार हो सकती है। मेजर सर्जरी में घुटना बदला जाता है। यह सर्जरी तभी की जाती है, जब बाकी सारे तरीके फेल हो जाएं और दर्द लंबे समय से लगातार बना हुआ हो।
Published on:
12 Oct 2017 12:35 pm
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