
Garhakakota Hanumanta Mata navratri durda
राजेन्द्र साहू. गढ़ाकोटा.
गढ़ाकोटा से 10 किलोमीटर दूर गाजर क्षेत्र ग्राम खारोतला के पास मां हनुमंता देवी का मंदिर भक्तों के आस्था का केंद्र बना है। यहां पर मां हनुमंता देवी विराजमान है। इस मंदिर की किवदंती के अनुसार हनुमंता एक इमली के पेड़ के नीचे खुले में विराजमान थी। गाजर क्षेत्र से लगे हुए करीब 14 गांव में इनकी मान्यता है। क्षेत्र में हर अच्छे बुरे कार्य में माता को पहले आमंत्रित किया जाता है। इमली के पेड़ के नीचे खंडार चबूतरा पर माता की मूर्ति स्थापित थी। उसके बाद लोगों ने वहीं पर उनको विराजमान कर एक मंदिर बनवाने की सोची। किंतु इमली के पेड़ के कारण मंदिर उस स्थान पर नहीं बन पा रहा था। लोगों ने मंदिर का निर्माण करवाना शुरू कर दिया जब दीवार 8 फीट ऊंचाई की हो गई तो इमली के पेड़ की डाली मंदिर में बाधक बन गई। लोगों ने उस इमली की डाल को काटने का प्रयास किया किंतु वह नहीं कटी। उन्होंने माता से आग्रह किया तो दूसरे दिन उक्त इमली की डाली अपने आप दीवार के बाहर हो गई जिसको आज भी देखा जा सकता है। उसके बाद मंदिर का निर्माण शुरू हो गया। देखते ही देखते करीब 30 साल से 40 साल के करीब आज मंदिर भव्य ने रूप ले लिया है। जन जनप्रतिनिधियों ने यहां के विकास में रुचि दिखाई । मां हनुमंता देवी का मंदिर क्षेत्र के सैकड़ों गांव के लोगों की आस्था का केंद्र हैं। बुजुर्गों के मुताबिक जहां आज माता का मंदिर है, वहां कभी निर्जन वन हुआ करता था ।पहले माता को गांजर खेर की माता, बड़ी माता व खेरमाई के नाम से जाना जाता था। लेकिन अब यह स्थान मां हनुमंता धाम के नाम से प्रसिद्ध है। हनुमंता धाम सात ग्रामों खारोतला, सेवास, रोन-कुमरई, छुल्ला, ऊंटखेरा व मड़िया के मध्य आता है। आसपास के कई गांवों में माता को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। लोगों के मुताबिक इस स्थान का वर्णन महोबा पन्ना रियासत गाजर की लड़ाई आल्हा खंड में मिलता है। वहां के राजा भानुप्रताप
व गढ़ाकोटा नरेश श्रीमर्दन सिंह जू देव के पूर्वज संबंधी थे। इसी के चलते राजा भानुप्रताप ने कुंअरपुर गांव में गढ़ का निर्माण किया। उन्होंने 10 एकड़ जमीन पर तालाब बनवाया था। इस तालाब का पानी खारा होने से इसका नाम खारोताल पड़ा। यहां आज भी पुराने गढ़ के अवशेष खंडर के रूप में मिलते हैं। माता के स्थान से पश्चिम दिशा में एक किमी दूर बेलाखेर का स्थान व तालाब है।
किवदंती है की किसी कारण वश राजा भानुप्रताप को यहां से पलायन करने पड़ा। वे मां हनुमंता को बैलगाड़ी में ले
जाने लगे। तब कुछ दूरी पर गाड़ी टूट गई और सभी लोग उनकी मूर्ति को आगे ले जाने में असमर्थ हो गए। लोगों ने सोचा की माता के प्रतिमा को दूसरे दिन ले जाएंगे, लेकिन सुबह जब उठे थे, मां की प्रतिमा वहां नहीं थी एक इमली के पेड़ के नीचे मिली।
यह प्रतिमा आज भी इसी इमली के वृक्ष के नीचे है। किवंदती के मुताबिक राजा भानुप्रताप अपनी हठता के चलते मूर्ति ले जाने चाहते थे, लेकिन माता इसी इमली के नीचे दरबार बनाकर रहना चाहती थीं। लोगों के मुताबिक मां हनुमंता देवी के दर में चलो शब्द वर्जित है। बुजुर्गों के मुताबिक गाजरखेड़ा क्षेत्र के तहत आने वाले गांवों में कोई भी
कोई नहीं कहता चलो-
व्यक्ति खेत में जुताई, बुबाई व कटाई आदि कृषि कार्य या बातचीत के दौरान चलो शब्द का उपयोग नहीं करता। इसकी जगह अन्य वैकल्पिक शब्द का उपयोग करते हैं। मां के दरबार में मां इतना प्यार देती हैं कि यहां से जाने की इच्छा ही नहीं होती। लोग मां को हृदय में बैठा कर ले जाते हैं। यहां पर हर बीमारी भूत बाधाओं से पीड़ित लोग पहुंचते हैं जो चैत्र एवं कुंवार की नवरात्रि में सबसे ज्यादा संख्या में भक्त लोग अपनी समस्याओं को लेकर यहां पहुंचते हैं एवं उनकी समस्याएं एवं बाधाएं दूर होती हैं।
Published on:
03 Apr 2019 02:28 pm
बड़ी खबरें
View Allसागर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
