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International press freedom day स्वतंत्रता के लिए जेल भी चले जाते थे कलम के सिपाही

अखबार में लिखने की थी पूरी स्वतंत्रता

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सागर

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Nitin Sadaphal

May 03, 2018

 International press freedom day

अधिवक्ता जवाहरलाल अग्निहोत्री बताते हैं कि आजादी के समय अखबारों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी की लड़ाई को एक नया रूप और आकार दिया जा रहा था, तभी सागर से ११ जून १९२३ को प्रकाश का प्रकाशन शुरू हुआ। शहर में मास्टर बलदेव प्रसाद ने इसकी शुरुआत की। इसके बाद यहां लगातार पत्रकारिता के आयाम गढ़े गए। १९७९ में उन्होंने भी सम-समाज नाम से अखबार का प्रकाशन किया। जिसमें सरकार के खिलाफ लिखने की पूर्ण आजादी थी। अखबार सोशलिज्म विचारधारा पर निकलता था। १९७० में अखबार में संपादकीय लिखा गया कि पाकिस्तान के दो टुकड़े होंगे। इसके एक साल बाद बांग्लादेश अलग राज्य बना। अखबार भले ही सागर से प्रकाशित होता था, लेकिन पूरे हिंदुस्तान की खबरें उसमें समाहित होती थीं।
ये भी हुए प्रकाशित

समलोचक: भाई अब्दुल गनी ने १९२४ में समलोचक नाम से अखबार शुरू किया। १९२९ के एक लेख छापने पर सरकार ने उन्हें ९ माह के लिए जेल में बंद कर दिया। स्वदेश: वर्ष १९२४ में ही हिंदी साप्ताहिक पत्र स्वदेश का प्रकाशन हुआ। इसके संपादक बाल ब्रह्मचारी केशव चंद खांडेकर थे।


देहाती दुनिया: वर्ष १९३७ से साप्ताहिक अखबार देहाती दुनिया की शुरुआत हुई। प्रकाशन अब्दुल गनी ने ही किया और अब भी यह अखबार प्रकाशित हो रहा है।

आजादी के पहले शुरू की पत्रकारिता
पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी आजादी के पहले से पत्रकारिता करते आ रहे थे। उनके नाम से पुत्र आशीष ज्योतिषी सिविल लाइन में पत्रकारिता संस्थान का संचालन कर रहे हैं। ज्योतिषी बताते हैं कि पिताजी ने स्कूल में हस्तलिखित पहली पत्रिका तरंग निकाली। उस समय वे एक्सीलेंस स्कूल में ही पढ़ाई किया करते थे। उन्होंने २६ जनवरी १९४७ को विंध्य केसरी की शुरुआत की। इसके पहले भी वे १९४४ से १९४६ तक नागपुर में समाचार पत्रों के संपादक रह चुके थे। समाचार पत्र का वार्षिक मू्ल्य ६ रुपए होता था। शीघ्र ही इसने प्रतिष्ठा हासिल कर ली थी। विंध्य केसरी में पं. पद्मनाथ तैलंग, महेश दत्त दुबे, शिवकुमार श्रीवास्तव भी ज्योतिषी के सहयोगी थे। उन्होंने बताया कि पिता के साथ विंध्य केसरी का संचालन कई वर्षों तक किया। ५० वर्षों तक विंध्य केसरी का प्रकाशन, जिसमें अपनी बात स्वतंत्र तौर से लिखी जाती थी। स्वतंत्रता से लिखने के लिए पिताजी को ब्रिटिश सरकार ने जेल भी भेजा, लेकिन वे लिखने से नहीं माने।

राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल था प्रकाश
११ जून १९२३ में प्रकाश का प्रकाशन किया गया। १३३ दिन तक अखबार प्रकाशित हुआ। प्रकाश पूरी तरह राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल था। यह इसके प्रत्येक अंक से झलकता है। इसके प्रत्येक अंक के प्रथम पेज पर छपता था कि क्रांतिकारियों और सत्याग्रहियों का अभिनंदन और वंदे मातरम। प्रत्येक अंक के प्रथम पेज पर दोहा छपता था।

ये भी पत्र-पत्रिका निक ले
हंटर- महेशदत्त दुबे - १९५१
जागृति- शिवकुमार श्रीवास्तव - १९५१
मधुकामिनी- शोभाराम श्रीवास्तव - १९५१
छात्रनिधि- प्रभुदयाल गुप्ता - १९५३
विन्यास- पं. माधव शुक्ल मनोज - १९५३
समवेत- राजा दुबे, अशोक वाजपेयी, प्रबोध कुमार और रमेश दत्त दुबे - १९५३
कर्तव्यदान- रामभरोसे पाठक - १९५३
जन-जनपुकार - भोलानाथ
पुरोहित- १९६३
सावधान- नाथूसोनी सोनी- १९५६
राही- प्रभुदयाल गुप्ता- १९६२
जय महाकाल - गौरीशंकर तिवारी- १९६०
नयी फसल- बलराम गौतम - १९६९
गौर दर्शन- भोलाराम भारतीय - १९७२
सागर सरोज- सुन्दरलाल तिवारी- १९७८