
dr harisingh gour
सागर. डॉ. हरिसिंह गौर एक ऐसी शख्सियत हैं, जो किसी परिचय की मोहताज नहीं। सागर विवि की स्थापना डॉ. सर हरीसिंह गौर ने सन 1946 में अपनी निजी पूंजी से की थी। यह भारत का सबसे प्राचीन तथा बड़ा विवि रहा है। अपनी स्थापना के समय यह भारत का 18वां तथा किसी एक व्यक्ति के दान से स्थापित होने वाला यह देश का एकमात्र विवि है। उनकी जयंती पर यहां हम विधिवेत्ता के रूप में सर गौर की उपलब्धि और कुछ रोचक पहलू बता रहे हैं।
देश की अदालतों में आज महिला वकील अच्छी खासी संख्या में हैं, लेकिन ज्यादातर लोग नहीं जानते होंगे कि यह भी डॉ.हरिसिंह गौर के प्रयासों से ही संभव हुआ था। डॉ. गौर ने ही नागपुर लेजिस्लेटिव असेंबली में वकालत प्रोफेशन में लैंगिक भेद खत्म करने के लिए 28 फरवरी 1923 को बिल पेश कर इस पर जमकर बहस की और लीगल प्रैक्टिशनर (वूमन) एक्ट 1923 को पास करवाया था।
असल में डॉ.गौर के पास महिला वकील के संबंध में पटना का एक मामला आया था, जिसे पटना के मशहूर वकील मधुसूदन दास लेकर गए थे। इसमें बताया गया था कि अधिवक्ता सुधांशु बाला हाजरा ने 28 नवम्बर १921 को पटना हाईकोर्ट में प्रैक्टिस के लिए एनरोल करने का आवेदन दिया। इस आवेदन को पटना हाईकोर्ट की फुलबेंच ने निरस्त कर दिया। हाजरा और उनके वकील मधुसूदन दास ने चीफ जस्टिस से लेकर सभी सक्षम अथारिटी तक लिखा-पढ़ी की लेकिन उन्हें निराशा ही मिली। तब दास को कानूनविद डॉ. हरिसिंह गौर की याद आई। उस समय सर गौर नागपुर लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य थे। दास ने डॉ. गौर के सामने समस्या को रखा था।
बेटी नहीं कर पाई वकालत
सर गौर ने अपनी बेटी स्वरूप कुमारी को 1931 में लीगल एजुकेशन के लिए इंग्लैंड के इनर टेंपल में वहीं भेजा, जहां से उन्होंने कानून पढ़ा था। डिग्री लेकर आईं स्वरूप कुमारी को इंग्लैंड के बार ने सम्मान पूर्वक वकालत के लिए आमंत्रित किया। लेकिन प्रारब्ध ने कुछ और तय किया था। वहां विलियम ब्रूम से स्वरूप का प्रेम हुआ। शादी हुई। ब्रूम भारत आकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार और जस्टिस बने। उनकी पत्नी के रूप में डॉ. गौर की बेटी स्वरूप ने भारत में कभी लीगल प्रैक्टिस नहीं की। वे डॉ. ब्रूम के न्यायिक कार्यों में अपने घर पर ही रहकर मदद करती रहीं।
Published on:
26 Nov 2017 11:58 am
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