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वीरों की धरती के गांव रोजी के खातिर सूने, घरों पर पत्थरों का पहरा

- पलायन का दंश - काम धंधे की कमी से दूसरे राज्यों में जा रहे मजदूर

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सागर

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Deepesh Tiwari

Jul 29, 2022

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सागर@बृजेश तिवारी

‘वीरों की धरती' कहलाने वाला बुंदेलखंड पलायन का दंश झेल रहा है। टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, पन्ना और दमोह जिलों से लोग काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जा रहे हैं। हाल ही में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दौरान अधिकतर गांव गुलजार हुए थे, लेकिन चुनाव के बाद गांव फिर वीरान होने लगे हैं। आलम यह है गांवों के अधिकतर घरों में ताले लटकते दिखाई दे रहे हैं।

घरों के आगे रखे पत्थर
जो लोग पलायन कर चुके हैं, उनके घरों पर ताले लटकते रहते हैं। पलायन कर चुके अधिकतर मजदूरों के मकान पुराने जमाने के बने हैं। जब मजदूर घर छोड़ते हैं तो वे घरों के बरामदे में पत्थरों की दीवार उठा देते हैं। इससे उनके घर सुरक्षित रहते हैं। दमोह जिले के हटा ब्लॉक के मड़ियादो क्षेत्र व तेंदूखेड़ा ब्लॉक के अनेक गांवों में ऐसे घर मिल जाएंगे, जिनके दरवाजे पत्थरों से ढंके हैं।

हजारों लोग जाते हैं बाहर
दमोह के 1 लाख 1 हजार 768 प्रवासी मजदूर हैं। इनकी संख्या का पता कोरोना काल में चला था। छतरपुर जिले के 1210 गांवों में से 800 गांव पलायन प्रभावित हैं। प्रवासी मजदूर लगभग 80 हजार हैं। इनमें से चुनाव के बाद लगभग 50 हजार लोग पलायान कर चुके हैं। टीकमगढ़ से लगभग दो लाख लोग पलायन करते हैं। सागर से डेढ़ लाख लोग चुनाव बाद काम करने बाहर गए हैं।

पंचायत चुनाव बाद फिर पलायन
छतरपुर जिले में रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर प्रवासी मजदूर परिवार व गृहस्थी के सामान के साथ बड़ी संख्या में नजर आने लगे हैं। गांव से बोरिया बिस्तर समेटकर रोटी के लिए महानगरों की ओर पलायन का ये सिलसिला त्योहारों के बाद हर साल नजर आता है, लेकिन 7 साल बाद हुए पंचायत चुनाव के बाद भारी भीड़ पलायन कर रही है। यह सिलसिला अभी जारी रहेगा।

यह प्रयास जरूरी
बुंदेलखंड से पलायन रोकने के लिए सरकार स्तर पर ऐसी योजना बनाई जाए जो जमीनी स्तर पर लोगों को रोजगार दे सकें। मनरेगा का काम जरूरतमंद हाथों को मिले। नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए जाएं, जिनमें स्थानीय लोगों को काम मिले। नई सिंचाई परियोजनाएं शुरू होने से खेती-किसानी सुधरेगी। स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा।

यह है कारण
बुंदेलखंड में नए कारखानों का टोटा है। बड़ी औद्योगिक इकाइयां दम तोड़ रही हैं। पलायन रोकने की कोई योजना कारगर नहीं रही। कृषि को लेकर नया प्रयोग नहीं दिख रहा है। पानी की भी बड़ी समस्या है। नतीजा, बेरोजगारी और रोजी-रोटी के जुगाड़ में बुंदेलखंड के लोग महानगरों के लिए पलायन करने लगे हैं। वे दिल्ली, गुजरात, मुंबई और हरियाणा, कानपुर, चंडीगढ़, हैदराबाद सहित अन्य महानगरों में काम पर जा रहे हैं।