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बांस को जलाने से हो सकता है यह बड़ा नुकसान, जान लीजिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

बांस को जलाने से हो सकता है यह बड़ा नुकसान, जान लीजिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

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सागर

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Samved Jain

Sep 18, 2019

बांस को जलाने से हो सकता है यह बड़ा नुकसान, जान लीजिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

बांस को जलाने से हो सकता है यह बड़ा नुकसान, जान लीजिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

सागर/ लकडिय़ों को जलते हुए देखा होगा, लेकिन क्या कभी बांस को जलते हुआ देखा है? हां, तो सिर्फ दुघर्टनाओं में। वह इसीलिए, क्योंकि भारत में बांस को जलाया नहीं जाता है। धार्मिक कारण के चलते वैसे तो बांस को नहीं जलाते है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक कारण भी है। हम अक्सर शुभ और अशुभ कामों के लिए विभिन्न प्रकार के लकडिय़ों को जलाने में प्रयोग करते है लेकिन क्या आपने कभी कि किसी काम के दौरान बांस की लकड़ी को जलता हुआ देखा है। जिसके कारण क्या हैं, आप जानेंगे।

भारतीय संस्कृति, परंपरा और धार्मिक महत्व के अनुसार, हमारे शास्त्रों में बांस की लकड़ी को जलाना वर्जित माना गया है। यहां तक की हम अर्थी के लिए बांस की लकड़ी का उपयोग तो करते है लेकिन उसे चिंता में जलाते नहीं।च् हिन्दू धर्मानुसार बांस जलाने से पितृ दोष लगता है वहीं जन्म के समय जो नाल माता और शिशु को जोड़ के रखती है, उसे भी बांस के वृक्षो के बीच मे गाड़ते है ताकि वंश सदैव बढ़ता रहे।

बांस को क्यों नहीं जलाते, ये है वैज्ञानिक कारण
धार्मिक मान्यता के अलावा बांस को न जलाने की एक बड़ी वैज्ञानिक मान्यता भी है। वैज्ञानिकों के रिसर्च के अनुसार बांस में लेड व हेवी मेटल प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। लेड जलने पर लेड ऑक्साइड बनाता है जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है। हेवी मेटल भी जलने पर ऑक्साइड्स बनाते हैं। लेकिन जिस बांस की लकड़ी को जलाना शास्त्रों में वर्जित है यहां तक कि चिता मे भी नहीं जला सकते। हम हमेशा अंधानुकरण ही करते है और अपने धर्म को कम आंकते है। जब कि हमारे धर्म की हर एक बातें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार मानवमात्र के कल्याण के लिए ही बनी है। अत: कृपया सामथ्र्य अनुसार स्वच्छ धूप का ही उपयोग करें।

बांस से बनी अगरबत्ती जलाने में भी नुकसान
हम उस बांस की लकड़ी को हमलोग रोज़ अगरबत्ती में जलाते हैं। अगरबत्ती के जलने से उतपन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केमिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है जो कि श्वांस के साथ शरीर में प्रवेश करता है, इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर मे पहुंचाती है। इसकी लेश मात्र उपस्थिति केन्सर अथवा मष्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नही मिलता सब जगह धूप ही लिखा है हर स्थान पर धूप, दीप, नैवेद्य का ही वर्णन है। अगरबत्ती का प्रयोग भारतवर्ष में इस्लाम के आगमन के साथ ही शुरू हुआ है। इस्लाम मे ईश्वर की आराधना जीवंत स्वरूप में नही होती, परंतु हमारे यंहा होती है। मुस्लिम लोग अगरबत्ती मज़ारों में जलाते है, उनके यंहा ईश्वर का मूर्त रूप नही पूजा जाता।