
‘उदयपुर फाइल्स’ के बाद ‘कल्कि संभल’ | Image - YT/@Atharv_Filmy_Entertainment
Kalki Sambhal Film Poster: फिल्म निर्माता अमित जानी ने अपनी आगामी फिल्म ‘कल्कि संभल’ का पोस्टर सोशल मीडिया पर जारी किया, जिसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। पोस्टर में दो प्रमुख किरदारों अब्बाजान और भाईजान को केंद्र में दिखाया गया है, जिनके नाम और प्रस्तुति को लेकर यूजर्स के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह की फिल्मों से सामाजिक माहौल पर असर पड़ सकता है, जबकि समर्थक इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इतिहास को सामने लाने का माध्यम बता रहे हैं।
फिल्म के कथानक को लेकर सामने आई जानकारी के मुताबिक, ‘कल्कि संभल’ में 1978 में संभल में हुए दंगों और 24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद सर्वे के दौरान हुए बवाल को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। निर्माता का दावा है कि इन दोनों अलग-अलग समय की घटनाओं को एक सिनेमाई धागे में पिरोकर सामाजिक और राजनीतिक भूमिकाओं को उजागर किया जाएगा। इसी दावे ने दर्शकों के बीच उत्सुकता के साथ-साथ विवाद को भी जन्म दिया है।
फिल्म में अब्बाजान की भूमिका में अनुभवी अभिनेता महेश मांजरेकर नजर आएंगे, जबकि भाईजान के किरदार को विजय राज निभाएंगे। बताया जा रहा है कि अब्बाजान का किरदार 1978 की घटनाओं से जुड़ा होगा, वहीं भाईजान का पात्र 24 नवंबर 2024 के बवाल की कड़ी से जुड़ता है। इन दोनों पात्रों की समानांतर कहानियों के माध्यम से फिल्म समाज में उभरे तनाव, राजनीति और प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं को दिखाने की कोशिश करेगी।
पोस्टर सामने आते ही सोशल मीडिया पर दो स्पष्ट धाराएं उभरकर सामने आईं। एक वर्ग ने फिल्म को इतिहास और सच्चाई को सामने लाने का प्रयास बताया, जबकि दूसरे वर्ग ने इसे संवेदनशील मुद्दों पर ‘उकसाने वाला कंटेंट’ करार दिया। ट्रेंडिंग हैशटैग्स और लगातार पोस्ट के जरिए यूजर्स अपनी-अपनी राय रख रहे हैं, जिससे फिल्म रिलीज़ से पहले ही व्यापक चर्चा का विषय बन चुकी है।
फिल्म निर्माता अमित जानी का कहना है कि ‘कल्कि संभल’ का उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि उन घटनाओं को सामने लाना है, जिनका प्रभाव आज भी समाज पर महसूस किया जाता है। उनके अनुसार, 1978 के दंगों के दौरान और 2024 की घटना में राजनीतिक व सामाजिक हस्तियों की भूमिका को सिनेमाई रूप में दर्शाया जाएगा, ताकि दर्शक खुद निष्कर्ष निकाल सकें।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सिनेमा का समाज पर कितना प्रभाव पड़ता है और संवेदनशील विषयों को किस हद तक पर्दे पर लाया जाना चाहिए। ‘कल्कि संभल’ न केवल एक फिल्म के रूप में, बल्कि सामाजिक संवाद के मंच के तौर पर भी उभरती दिख रही है, जहां इतिहास, राजनीति और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर व्यापक बहस छिड़ चुकी है।
Updated on:
4 Feb 2026, 6:57 AM IST
Published on:
4 Feb 2026, 6:57 AM IST
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