
रायबरेली. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 का बिगुल बज चुका है। हर कोई दल वोटरों को लुभाने लगा है। सड़कों पर अलग-अलग पार्टियों के लुभावने वादे बैनरों के साथ लटक रहे हैं। पार्टियां इस बार दूसरी पार्टियों के घर में सेंध लगाने की तैयारी में हैं। ऐसा ही चुनावी माहौल रायबरेली की बछरावां सीट पर देखने को मिल रहा है। यह सीट कभी कांग्रेस की हुआ करती थी। 2017 के चुनाव में इस विधानसभा सीट पर मतदाताओं ने कमल का फूल खिलाया तो भाजपा प्रत्याशी रामनरेश रावत विधायक बने। लेकिन, भाजपा का जनप्रतिनिधि होने के बावजूद विकास के मामले में क्षेत्र बहुत पिछड़ा हुआ है। यहां के किसान आज भी सिंचाई के संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। वहीं, ग्रामीण क्षेत्र का पानी पीने के लायक नहीं है। रोजगार के साधन नहीं मिलने के कारण यहां के युवा बड़े-बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जनता हर बार इस आस में अपने नेता चुनती है कि वह उनकी समस्याओं का निराकरण करा सके, लेकिन भाजपा की सरकार होने के बावजूद स्थिति जस की तस है। जनता की इसी आवाज को उठाने के लिए 12 दिसंबर रविवार को 'पत्रिका' का संवाद सेतु कार्यक्रम होगा। इस कार्यक्रम के जरिये जनता की बात सरकार और सरकार की बात जनता तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। खुद 'पत्रिका' ग्रुप के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी संवाद सेतु कार्यक्रम में शहर के प्रबुद्ध वर्ग से पांच प्रमुख समस्याओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
रायबरेली जिले की बछरावां विधानसभा सीट पर पहला चुनाव 1957 में आजाद भारत की हवा में हुआ था। इस प्रथम चुनाव में कांग्रेस ने इस सीट पर जीत हासिल की थी। कांग्रेस प्रत्याशी रामेश्वर प्रसाद और चंद्रिका प्रसाद इस सीट से चुने गए थे। इसके बाद दूसरा चुनाव 1962 में हुआ तो एसओसी के टिकट पर भगवान दीनपर ने यहां से जीत हासिल की थी। 1962 में पहली बार इस सीट पर कांग्रेस हारी थी। इस हार के बाद कांग्रेस ने इस सीट पर पूरा ध्यान दिया और नतीजा रहा कि 1967, 1969, 1974 और फिर 1977 में कांग्रेस बार-बार इस सीट पर जीती। इस तरह इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी रामदुलारे लगातार चार बार विधायक चुने गए। इसके बाद 1980, 1985, 1989 व 1991 में भी कांग्रेस प्रत्याशी शिवदर्शन लगातार जीतते रहे।
1993 से बदलते रहे समीकरण
1993 में उत्तर प्रदेश की लगभग हर सीट पर सियासी समीकरण बदल रहे थे। जाहिर सी बात है कि बदलते समीकरणों का असर बछरावां पर भी पड़ना था। यही हुआ भी, 1993 में भाजपा ने कांग्रेस से यह सीट छीन ली। उस दौरान राजाराम त्यागी ने यहां से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और मजबूती के साथ जीत हासिल की। इसके बाद 1996 में पहली बार यह सीट बसपा के खाते में भी गई। तब श्याम सुंदर विधायक बने। 2002 में फिर जनता ने बसपा से यह सीट छीन ली और मौका समाजवादी सरकार को दिया। तब इस सीट से रामलाल अकेला को जनता ने अपना विधायक चुना। 2007 में राजाराम यहां से विधायक चुने गए तो 2012 में फिर यह सीट सपा के खाते में चली गई। 2017 में भाजपा के रामनरेश रावत यहां से विधायक बने।
प्रमुख समस्याएं
बछरावां विधानसभा क्षेत्र विकास के मामले में बहुत पिछड़ा हुआ है। यहां कि अधिकतर ग्रामीण आबादी खेती किसानी पर निर्भर है, लेकिन सिंचाई के संसाधन नहीं होने के कारण किसान परेशान हैं। सड़की की हालत बेहद खराब है। मुख्यमंत्री बनते सड़कों को गड्ढामुक्त करने की बात कहने वाले योगी आदित्यनाथ भी यहां उस गति से विकास नहीं करा सके। बिजली-पानी की व्यवस्था भी यहां कुछ खास नहीं है। पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण ग्रामीण बीमार हो रहे हैं। वहीं, स्वास्थ्य सुविधाओं की भी कमी है।
2017 का विधानसभा चुनाव के नतीजे
- भाजपा प्रत्याशी रामनरेश रावत को कुल 65324 मत मिले।
- कांग्रेस प्रत्याशी साहब सरन को कुल 43015 मत मिले।
- बसपा प्रत्याशी श्याम सुंदर को कुल 33582 मत मिले।
- जीत का अंतर 22309 मतों का रहा।
2012 विधानसभा चुनाव के नतीजे
- समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी रामलाल अकेला को 59576 मत मिले।
- आरएसबीपी के सुशील कुमार को 31628 मत मिले।
- कांग्रेस प्रत्याशी राजाराम त्यागी को 29317 मत मिले।
- बसपा प्रत्याशी जगजीवन राम को 25624 मत मिले।
- जीत का अंतर 27948 मतों का रहा।
Published on:
11 Dec 2021 04:12 pm
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