
साइंस एंड टैक : डिजिटल संचार ने बढ़ाई समस्या
एरिक रॉस्टन, (सस्टेनेबिलिटी एडिटर, ब्लूमबर्ग)
भीषण गर्मी, बाढ़ और अकाल जैसी आपदाओं के बीच कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है कि लोग इस भयावह संकट को पहचानें और कम से कम इस पर एकमत हों, लेकिन इतिहास गवाह है कि वे नहीं होंगे। इसमें काफी कुछ दोष भ्रामक जानकारियों की महामारी का है, जो जलवायु परिवर्तन, कोविड-19, वैक्सीन व अन्य कई विषयों पर सोशल मीडिया में तेजी से फैल रही हैं।
विख्यात लेखक जोसेफ बैक कोलमैन ने अपने नए लेख में इस बारे में नीति निर्माताओं को चेताया है कि डिजिटल प्रौद्योगिकी कैसे जलवायु परिवर्तन एवं अन्य गंभीर समस्याओं के समाधान में बाधक बन रही है। उन्होंने मछलियों के व्यवहार का उदाहरण दिया। मछलियों के व्यवहार पर अध्ययन के जरिए बताया कि किस प्रकार अलग-अलग झुंड में बहुत सी मछलियां तैर रही होती हैं, लेकिन खतरे का आभास होते ही वे एक-दूसरे को बताते हुए एक साथ उस खतरे से बाहर निकलने में सफल हो जाती हैं। उनके पास भ्रामक जानकारी न होने का फायदा यह होता है कि मछलियां बमुश्किल ही कोई गलती करती हैं। कोलमैन के शब्दों में-'अगर आप बिना किसी वजह के डर जाते हो तो आपकी ऊर्जा डरने में व्यर्थ हो जाती है और अगर आप सही समय पर नहीं डरते, तो इससे आपकी जान जोखिम में रहती है। इस बात को गंभीरता से समझना होगा कि डिजिटल संचार प्रणाली के विकास से सदियों पुराना सामुदायिक संरक्षण का भाव खत्म होता जा रहा है, जो कम से कम सही जानकारी का प्रसार सुनिश्चित करता है, जिससे सही निर्णय का मार्ग प्रशस्त होता है। अपने सह लेखकों के साथ वे लिखते हैं-'एक साथ झूठ का प्रसार मानव कल्याण के लिए बहुत बड़ा खतरा है।' प्रौद्योगिकी के जरिए मानव दूर बैठकर भी तुरंत संवाद कर सकता है। अब इसी वक्तव्य को इस प्रकार कहा जाए-'क्या होता है जब लोग एक दूसरे से दूर रहते हुए तुरंत संवाद कर सकते हैं। उक्त वक्तव्य और अनुत्तरित सवाल के बीच का तनाव ही आज विश्व की सबसे बड़ी समस्याओं का कारण है। जैसे शारीरिक विज्ञान में दवाएं और जलवायु विज्ञान में उत्सर्जन के उपाय किए जाते हैं, वैसे डिजिटल भ्रामक जानकारी महामारी के इलाज के लिए भी व्यावहारिक विज्ञान या 'संकट अनुशासन' की आवश्यकता है।
विश्व भर में 5 बिलियन से ज्यादा मोबाइल उपभोक्ता और 3.6 बिलियन सोशल मीडिया अकाउंट मानव समुदाय में बड़ा हस्तक्षेप कर रहे हैं। पिछले दो दशकों से कम अवधि में मानव संवाद करीब आठ गुना बढ़ गया है। इससे गलत जानकारियों का प्रसार बहुत आसान हो जाता है और वे लोगों के जीवन को अधिक प्रभावित करती हैं। जलवायु परिवर्तन संचार पर येल कार्यक्रम के संस्थापक निदेशक एंथनी लिजरोविट्ज के अनुसार लेख में आधुनिक विश्व को समझने के लिए नए चश्मे की जरूरत बताई गई है। डिजिटल संचार समस्या पर जितना ध्यान देना चाहिए था, वह नहीं दिया गया।
Published on:
02 Jul 2021 11:59 am
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