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हर पल जान की जोखिम : फिर भी 147 फीट गहराई में जाकर लहराया तिरंगा

एक छोटे से गांव में रहने वाली बेटी मेघा ने विश्व रेकॉर्ड बनाया है, उन्होंने माउंट एवरेस्ट फतह करने के साथ ही स्कूबा डाइविंग में 45 मीटर गहराई में जाकर तिरंगा लहरा दिया है।

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हर पल जान की जोखिम : फिर भी 147 फीट गहराई में जाकर लहराया तिरंगा

हर पल जान की जोखिम : फिर भी 147 फीट गहराई में जाकर लहराया तिरंगा

सीहोर. मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के एक छोटे से गांव में रहने वाली बेटी मेघा ने विश्व रेकॉर्ड बनाया है, उन्होंने माउंट एवरेस्ट फतह करने के साथ ही स्कूबा डाइविंग में 45 मीटर गहराई में जाकर तिरंगा लहरा दिया है। स्कूबा डाइविंग में समुद्र की गहराई में जाना कोई छोटा काम नहीं होता है, इसमें हर पल जान की जोखिम बनी रहती है, लेकिन इसके बावजूद मेघा ने अपनी मेहनत और लगन से कर दिखाया।

4 महाद्वीप के शिखरों को किया फतह
जिले के छोटे से गांव भोजनगर की बेटी मेघा परमार विश्व की पहली महिला है, जिन्होंने 4 महाद्वीप के शिखरों को फतह कर अब 147 फीट (45 मीटर) स्कूबा डाइविंग कर दुनिया में भारत का परचम लहराया है। मध्यप्रदेश शासन की बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान की ब्रांड एंबेसडर मेघा परमार ने साल 2019 में माउंट एवरेस्ट फतह किया था, ऐसा करने वाली प्रदेश की पहली महिला बनी।

147 फीट गहराई में जाकर लहराया तिरंगा
अब मेघा ने 147 फीट (45 मीटर) की टेक्निकल स्कूबा डाइविंग कर नया विश्व रेकॉर्ड बनाया है। वह विश्व की पहली महिला हैं, जिन्होंने माउंट एवरेस्ट को फतह किया है और साथ-साथ टेक्निकल स्कूबा डाइविंग में समुद्र के अंदर 45 मीटर की गहराई तक डाइव की है। मेघा परमार ने यह रेकॉर्ड बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान को समर्पित किया है। मेघा परमार बीते डेढ़ वर्ष से स्कूबा डाइविंग की तैयारी कर रहीं थीं। उन्होंने इस दौरान हर दिन 8 घंटे प्रैक्टिस की और कुल 134 बार डाइविंग की। मेघा परमार ने बताया कि मेरे पास भारत से बाहर जाकर ट्रेनिंग करने का विकल्प था, भारत में इसके लिए कोच नहीं मिलते। अर्जेंटीना से कोच वॉल्टर को भारत बुलाया गया।

पर्वत पर चढऩे के बाद सोचा समुद्र में तिरंगा लहराऊंगी
मेघा परमार ने बताया कि जब मैंने माउंट एवरेस्ट पर मप्र की बेटी के रूप में तिरंगा झंडा फहराया, उस वक्त मन में संकल्प लिया कि एक दिन देश की बेटी बनकर तिरंगा लहराऊं। मेरे मन में था कि पर्वत चढ़ लिया, लेकिन अब समुद्र की गहराई में जाकर तिरंगा लहराऊंगी। मुझे पता चला कि इसके लिए टेक्निकल स्कूबा डाइविंग करनी पड़ेगी, लेकिन मेरे मन में दृढ़ संकल्प था, जिसे में अपनी मेहनत से पूरा करना चाहती थी। पहले मुझे स्वीमिंग तक नहीं आती थी, जिसके लिए स्वीमिंग की ट्रैनिंग लेनी पड़ी। फिर उसके बाद लगातार डेढ साल तक हर दिन 8 घंटे ट्रेनिंग की। स्कूबा डाइविंग के सभी कोर्स किए इस दौरान 1३4 डाइव की। इसमें जान जाने के जोखिम होते हैं, जो ऑक्सीजन धरती पर इंसान के लिए अमृत रहती है। वहीं समुद्र में शरीर के अंदर ज्यादा मात्रा में हो जाने पर जान पर बन आती है। जिससे इसांन पैरालिसिस जैसी अन्य गंभीर बीमारी का शिकार हो सकता है। और जान भी जा सकती है। इस खेल में आपको शारीरिक रूप से ज्यादा मानसिक तौर पर ज्यादा मजबूत होना पड़ता है। कई बार डाइव की तैयारी में मेरे पैरों पर 11-11 किलो के सिलेंडर गिरे जिससे गंभीर चोटों का सामना करना पड़ा। मेरे लिए सबसे मुश्किल पूरे सफर में पढ़ाई कर टेक्निकल डाइविंग का एग्जाम पास करना था जिसमें फिजिक्स एवं मैथ्स के जटिल सवालों का अध्ययन करना पड़ता था।

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माउंट एवरेस्ट और स्कूबा डाइविंग में क्या मुश्किल
मेघा ने बताया कि दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र के माउंट एवरेस्ट हैं। माउंट एवरेस्ट का दूसरा अर्थ ही मुश्किल और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन आप इस बात से यह अंदाजा लगा सकते हैं कि अभी तक भारत में 80 से कम महिलाओं ने माउंट एवरेस्ट फतह किया है, लेकिन मैं इस देश में समुद्र में 45 मीटर तक टेक्निकल डाइव करने वाली महिलाओं के नाम तक नहीं मिलते। मेरे लिए दोनों अनुभव चुनौतीपूर्ण और सुंदर सपने की तरह है, जो भगवान की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति को देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।