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बड़े भाई ने मजदूरी कर पढ़ाया, छोटे ने अफसर बनकर दिखाया कमाल

किसान के बेटे ने किया कमाल, बना असिस्टेंट डायरेक्टर, एमपीपीएससी की असिस्टेंट डायरेक्टर ऑफ एग्रीकल्चर परीक्षा में जनरल कैटेगरी में पाया सातवां स्थान

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सेंधवा. सच्ची लगन और संघर्ष के साथ जो सफलता मिलती है वह हर स्तर पर अन्य लोगों के लिए एक मिसाल बन जाती है। ऐसा ही एक उदाहरण सेंधवा के किसान के बेटे रेहम डावर ने पेश किया है। रेहम ने विपरीत परिस्थितियों में शिक्षा के बल पर एमपीपीएससी परीक्षा में सातवीं रैंक हासिल कर अपने गांव के साथ सेंधवा का नाम भी रोशन किया है। अब असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में सेवा करेंगे। खास बात यह है कि रेहम की पढ़ाई के लिए उनके बड़े भाई ने मजदूरी तक की।

सेंधवा विधानसभा के पहाड़ी क्षेत्रों में जहां शिक्षा एक संघर्ष से कम नहीं है वहां पर आदिवासी किसान का बेटा रेहम डावर ऐसे आदिवासी विद्यार्थियों के लिए मिसाल बन गया है, जो और सुविधाओं को अपनी असफलता का कारण मानते हैं। सेंधवा तहसील के कामोद गांव में किसान शोभाराम डावर के पुत्र रेहम डावर ने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित असिस्टेंट डायरेक्टर ऑफ एग्रीकल्चर की परीक्षा जनरल केटेगरी में 7वीं रैंक हासिल कर सफलता प्राप्त की है।

किसानों को प्रोत्साहित करना जीवन का उद्देश्य: रेहम डावर ने बताया कि छोटे किसान ज्यादा रिस्क नहीं ले सकते है। इसलिए उन्हें मोटिवेट कर के छोटे-छोटे ब्लॉक में खेती के नए तरीके बताकर जागरूक करना मुख्य उद्देश्य रहेगा। किसानों के अंदर या विश्वास जगाने की आवश्यकता है कि वह भी खेती में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते है।

पिछले 6 माह में तीन बड़ी परीक्षाएं उत्तीर्ण की
रेहम डावर 12वीं शासकीय उत्कृष्ट स्कूल भगवानपुरा से प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद जवाहरलाल नेहरू कॄषि विश्वविद्यालय जबलपुर के तहत कृषि महाविद्यालय बालाघाट, कृषि विद्यापीठ अकोला महाराष्ट्र मेें कृषि विषयों पर डिग्रियां प्राप्त की। पिछले 6 माह में बैंक ऑफ महाराष्ट्र प्रवेश परीक्षा, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी और वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी की परीक्षा उत्तीर्ण की है। अब असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में कृषि के क्षेत्र में सेवाएं देंगे।

बड़े भाई ने पढ़ाने के लिए घर से दूर महाराष्ट्र जाकर मजदूरी की— डावर ने बताया कि मेरे परिवार में माता-पिता के अलावा हम चार भाई है। सबसे बड़े भाई राजू ने हम भाइयों को पढ़ाने के लिए घर से दूर महाराष्ट्र जाकर मजदूरी की और पैसा घर भेजा। इससे हमारा शिक्षा का खर्च निकला। मेरा एक भाई राकेश डावर वर्तमान में वरला तहसील में पटवारी के पद पर है। शुरू से ही हमारे परिवार में पढ़ाई को महत्व दिया। पिता की मात्र 2 एकड़ खेती के कारण आर्थिक रूप से संघर्ष करना पड़ा, लेकिन शिक्षा के बल पर सफलता मिली है।

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