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अधिवक्ता के काले कोट के कंधों पर टिका हैं न्याय व्यवस्था का भार

- अंतिम पायदान के व्यक्ति की भी बात दमदारी से करते हैं अधिवक्ता- 'पत्रिकाÓ से अधिवक्ताओं की बातचीत

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अधिवक्ता के काले कोट के कंधों पर टिका हैं न्याय व्यवस्था का भार

अधिवक्ता के काले कोट के कंधों पर टिका हैं न्याय व्यवस्था का भार

सिवनी. न्याय व्यवस्था अधिवक्ता के काम पर टिकी है। लोगों को न्याय इसलिए मिल रहा है क्योंकि अधिवक्ता उपलब्ध है। अधिवक्ता न्यायालय के अधिकारी हैं।

कभी कभी वह न्यायधीश से उच्चस्तरीय प्रतीत होते हैं, क्योंकि संपूर्ण न्याय व्यवस्था का भार इनके काले कोट के कंधों पर है। अगर अधिवक्ता न हो तो जनता को न्याय मिलना असंभव हो जाएगा। यह बात अधिवक्ता दिवस की पूर्व संध्या पर न्यायालय परिसर में अधिवक्ताओं ने 'पत्रिकाÓ से कही।


'पत्रिकाÓ से बातचीत के दौरान कुछ अधिवक्ताओं का दर्द भी छलक कर सामने आया। संयुक्त अधिवक्ता महासंघ के जिलाध्यक्ष जयदीप बैस ने कहा कि अधिवक्का का स्टेटस बड़ा होता है। धरती पर भगवान की उपाधि से संबोधित किए जाने वाले डॉक्टर जब न्यायालय में आते हैं तो वे विटनेस बाक्स में खड़े होते हैं। अधिवक्ता डायस पर खड़ा होकर उनसे सवाल करते हैं। लेकिन समाज के लोगों की पहली पसंद डॉक्टर हैं, जबकि अधिवक्ता अंतिम विकल्प हैं।

जिला अधिवक्ता संघ के कोषाध्यक्ष अजय बाबा पांडेय ने कहा कि विधि शासन को बनाए रखने में अधिवक्ता की महत्वपूर्ण भूमिका है। व्यक्ति अपने अधिकारों के अतिक्रमण होने पर न्यायालय की ओर रूख करता है। न्यायालय का रास्ता वकील के मार्गदर्शन में ही पाया जाता है। भारत की विषाद न्याय व्यवस्था को समझने और उस पर कार्य करने के लिए विशेष कौशल होना चाहिए।

आमजन साधारण का ऐसा कौशल पाना सरल कार्य नहीं है। अधिवक्ता का अभ्यास ही ऐसे कौशल को जन्म देता है।

अधिकारों के अतिक्रमण की दशा में अधिवक्ता की सहायता लिया जाना आवश्यक है। कोई अधिवक्ता ही आपके वैधानिक और मौलिक अधिकारों के लिए न्यायालय तक आपको ला सकता है। इसलिए समाज के हर वर्ग को अधिवक्ताओं का विशेष सम्मान करना चाहिए। न्यायालय में अंतिम पंक्ति के व्यक्ति की बात भी अधिवक्ता दमदारी से रखता है।

यह बात अधिवक्ता दिवस की पूर्व संध्या पर न्यायालय परिसर में अधिवक्ताओं ने 'पत्रिकाÓ से कही।