
सिवनी. हिन्दी एक समृद्ध भाषा है, जिसके पास उसकी बोलियों की बहुत बड़ी ताकत है। हिन्दी के अंदर यह एक सबसे बड़ी खूबी है कि वह सहज ढंग से स्वीकार्य सभी शब्दों को समाहित करने की क्षमता रखती है। यह कहना है शहर के प्रबुद्ध नागरिक एवं एक स्कूल एवं दो कॉलेज को संचालित करने वाले 58 वर्षीय केके चतुर्वेदी का। जिसकी सफलता में हिन्दी भाषा का अहम योगदान है। आज हिन्दी की वजह से वे जिले में एक स्कूल एवं दो कॉलेज के माध्यम से शिक्षा की ज्योत जला रहे हैं। सिवनी निवासी केके चतुर्वेदी ने अपनी मेहनत के दम पर सफलता की ऊंचाईयों को छुआ है। वे आज हर वर्ग के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गए हैं। उन लोगों में से हैं जिन्होंने अलग खड़े होना तो चुना मगर असफलताओं से हारे नहीं। उनकी शुरुआती पढ़ाई लखनवाड़ा के स्कूल में हुई। इसके बाद पीजी कॉलेज से उन्होंने बीएससी और फिर एमएससी किया। पूरी पढ़ाई हिन्दी माध्यम से ही हुई। पढ़ाई का शौख उन्हें शुरु से रहा। इसलिए उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, इतिहास, भौतिक, गणित विषय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई भी पूरी की। केके चतुर्वेदी कहते हैं कि हिंदी आज जनमानस की भाषा हो चुकी है। मुझे हमेशा हिंदी की वजह से मान-सम्मान मिला। हिन्दी के प्रभाव से ही मैंने उपलब्धि हासिल की। हिन्दी एक ऐसी सशक्त भाषा है जिसे कभी छोड़ा नहीं जा सकता है। यह हमारे देश की संस्कृत में बसा हुआ है। हिंदी की उपयोगिता बहुत जरूरी है। सभी क्षेत्रीय भाषा हिंदी से जुड़ी हुई है। तमाम रुकावटों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हिन्दी अगर देश-विदेश के अंदर सहस्त्र धाराओं में अलग-अलग माध्यमों से प्रस्फुटित हो रही है, तो कोई शक नहीं कि हिन्दी में कोई खूबी अवश्य है।
भारत को आजाद कराने में बड़ा योगदान
केके चतुर्वेदी कहते हैं कि इंटरनेट ने हिन्दी भाषा और सोच को एक नई जीवन रेखा दी है। हिन्दी राष्ट्रभाषा ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने योग्य स्थान रखती है। हिन्दी केवल भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, नेपाल, मारीशस, त्रिनिनाद सहित अन्य कई देशों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली समझी जाती है। उनका मानना है कि हिन्दी भाषा का भारत को आजाद करवाने में सबसे बड़ा योगदान रहा है। यह राष्ट्रीय आंदोलन की भाषा रही है। बंगाली होने के बावजूद नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपना भाषण हिन्दी में दिया था और उसके बाद भी वह सभी जगह सार्वजनिक भाषण हिन्दी में ही दिया करते थे। महात्मा गांधी ने भी गुजरात वासी होने के बावजूद आजादी के आंदोलन में विश्व को अपना संदेश हिन्दी में ही दिया। इसी तरह अनेक क्रांतिकारियों ने हिन्दी भाषा को अपना माध्यम बनाया।
बोलचाल की भाषा हिंदी होना जरूरी
58 वर्षीय केके चतुर्वेदी कहते हैं कि अंग्रेजी भाषा का महत्व भले ही बढ़ा है, लेकिन हिंदी भाषा का महत्व न कभी कम हुआ था और न होगा। इसके पीछे वजह यह है कि आज कोई भी ऐसी जगह नहीं है जहां हिंदी को प्राथमिकता न दी जाती हो। विदेशों ने भी इस भाषा का लोहा माना है। जीवन में अंग्रेजी तो जरूरी है, लेकिन बोलचाल एवं कार्य की भाषा हिंदी होनी चाहिए। हिन्दी को पहली भाषा का दर्जा मिलना चाहिए।
हिंदी की वजह से मंच सांझा करने का मिला अवसर
एकांकी, दीपदान नाटक लिखने वाले प्रसिद्ध डॉ. रामकुमार वर्मा के साथ केके चतुर्वेदी को मंच सांझा करने का अवसर मिला उन्होंने बताया कि अगर मेरी पकड़ हिन्दी भाषा पर नहीं होती तो इतने बड़े लोगों के साथ बैठने का अवसर नहीं मिलता। इसके अलावा भी जीवन में कई ऐसे मोड़ आए जहां हिन्दी ने मुझे काफी मान-सम्मान दिलाया। आज भी मेरी पहचान एक हिंदी प्रेमी के रूप में ही है।
Updated on:
15 Sept 2024 03:36 pm
Published on:
15 Sept 2024 02:45 pm
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