
patrika
13वीं सदी में बने आष्टा के काली मंदिर का रखरखाव पुरातत्व विभाग करता है। इस मंदिर में जिले के लोगों की काफी आस्था है और नवरात्रि जैसे पर्वों में यहां लोगों का आना काफी बढ़ जाता है। इस मंदिर के जीर्णोद्धार किया जा रहा है। नवरात्रि के चलते मंदिर का काम रोक दिया गया था।
स्थापत्य कला का नमूना
बरघाट तहसील मुख्यालय से 25 किमी दूर स्थित आष्टा का यह मंदिर जिले के शानदार अतीत की कहानी कहता है। हजारों बड़े बड़े पत्थरों पर खड़ा यह भव्य मंदिर पिछली आठ सदियों से मौसम की मार को झेलता हुआ खड़ा है। मंदिर की स्थापत्य कला की यह विशेषता है कि यह मंदिर हिमांद पंथी शैली का है और मंडप के चौकोर पत्थरों को लोहे की छड़ों से कसा गया है।
एक रात में बना था मंदिर
जनश्रुति है कि इस मंदिर का निर्माण एक ही रात में हुआ था। लोगों का कहना है कि देवी मां के चमत्कार से मंदिर एक रात में बना था लेकिन किसी तरह का व्यवधान आ जाने के कारण मंदिर का काम अधूरा ही रह गया। जिसकी निशानी गढ़े हुए पत्थर आज भी परिसर में ही फैले हुए हैं। वहीं पुरातत्व विभाग का कहना है कि दरअसल यह मंदिर विदर्भ के देवगिरि (वर्तमान दौलताबाद) के यादव राजाओं महादेव और रामचंद्र के मंत्री हिमांद्रि ने बनवाया था। वर्तमान में नजर आने वाला मंदिर ध्वंशावशेषों के रुप में है।
क्यों पड़ा आष्टा नाम
जहां यह मंदिर स्थित है उस गांव का नाम आष्टा है। कहा जाता है कि यादव राजाओं ने सैकड़ों की संख्या में मंदिरों का निर्माण कराया था। उस दौरान वास्तुकला से जुड़ी एक विशिष्ट शैली अपनाई गई थी जिसे हिमांद पंथी स्थापत्य शैली के नाम से जाना जाता है। इस शैली के आठ मंदिर इस स्थान पर थे। आठ (अष्ट)मंदिरों के कारण इस जगह का नाम आष्टा पड़ा है।
मंदिर की विशेषता
आष्टा में फिलहाल दो मंदिर और एक मंडप है। मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है। प्रतिमा मंदिर के पीछे दीवार े सटी हुई उत्तर की ओर मुख किए काली जी की दसभुजी पाषाण प्रतिमा है। मंदिर निमार्ण में उपयोग की गई चट्टानों को शीशे और लोहे की छड़ों के द्वारा खांचों में स्थापित करते हुए कसा गया है जिससे भार संतुलित रह सके।
बड़ी खबरें
View Allट्रेंडिंग
