
खूब लड़ी मर्दानी...कवियत्री की हादसे में यहीं गई थी जान
सुनील बंदेवार सिवनी. हिन्दी भारत का गौरव है, लेकिन हावी होती पाश्चात्य संस्कृति के बीच हिन्दी के गौरव को बढ़ाने वाले, अपनी लेखनी से नाम अमर करने वाले साहित्यकारों, कवि-कवियत्री की स्मृतियों को सहेजने अथवा हिन्दी दिवस पर उन्हें याद करने का प्रयास तक नहीं हो रहा है। ऐसा ही हिन्दी दिवस के मौके पर भी देखने को मिला। वसंत कोकिला कही जाने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान के स्मारक पर हिन्दी दिवस पर भी वीरानगी छाई रही।
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी, जैसी कविताओं से भारतीय स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय भावना का शंख फूंकने वाली अग्रिम पंक्ति की कवियत्री एवं हिन्दी की वसंत कोकिला कही जाने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान 15 फरवरी 1948 को तत्कालीन मप्र की विधानसभा नागपुर की बैठक से भाग लेकर कार से अपने गृह नगर जबलपुर लौट रही थीं। कार उनके पुत्र विजय चौहान चला रहे थे। सिवनी के कलबोड़ी ग्राम में मुर्गियों का एक झुंड रास्ता पार करता हुआ दिखाई दिया। सुभद्राजी चिल्लाईं बेटे धीरेए कहीं कोई मुर्गी दब न जाए। मुर्गी तो बच गईए लेकिन कार का संतुलन बिगड़ गया और लडखड़़ाती कार पेड़ से टकराकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी।
सिवनी जिले में कुरई विकासखण्ड के कलबोड़ी गांव के इसी स्थान पर सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपने जीवन की अंतिम सांस ली थी। वर्षों वाद कवियत्री की स्मृति में 15 फरवरी 2009 को उनकी पुण्यतिथि पर एक स्मारक बनाया गया, जो कि जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। हालात ये हैं कि स्मारक के आसपास गाजर घास, झाडिय़ां उग आई हैं। वहां पहुंचने के लिए कीचड़ व गड्ढों में भरे पानी से होकर जाना पड़ता है। हालांकि अब यहां कम ही अवसर पर लोग पहुंचते हैं।
सुभद्रा कुमार चौहान स्मृति मंच के अध्यक्ष, साहित्यकार मोहन सिंह चंदेल ने शासन-प्रशासन की बेरूखी पर असंतोष जाहिर करते बताया कि स्मारक स्थल पर शासन-प्रशासन ने आज तक कोई ध्यान नहीं दिया है। जनभागीदारी से ही इस स्थान पर स्मारक बना और कवियत्री की पुण्यतिथि पर 15 फरवरी को हर वर्ष कार्यक्रम किया जाता है। बताया कि हिन्दी दिवस पर यहां कोई आयोजन नहीं होता। साथ ही कहा कि स्मारक को संरक्षित करने के लिए उनके द्वारा अपने स्तर से प्रयास किए जा रहे हैं।
Published on:
15 Sept 2021 08:37 pm

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