
Due to the dream of employment, Phulpur went to Methane gas
शहडोल. आदिवासी अंचल में मीथेन गैस का भंडार मिलने से लोगों में रोजगार की काफी उम्मीदें जगी थी और रिलायंस कम्पनी के सीबीएम प्रोजेक्ट के माध्यम से लोगों को रासायनिक खाद एवं विद्युत उत्पादन के कारखानों में रोजगार उपलब्ध कराने के साथ घर-घर गैस पहुंचाने का सपना भी दिखाया गया था, मगर अंचल के बेरोजगारों के सारे अरमानों पर पानी फेरते हुए मीथेन गैस फूलपुर चली गई है। आदिवासी अंचल में रोजगार की उम्मीदों पर पानी फेरने की यह कोई नई घटना नहीं है, बल्कि कोयला उत्पादन, पेपर मिल, सोडा फैक्ट्री सहित अन्य कई उद्योग धंधो में भी क्षेत्रीय बेरोजगारों को ठगा गया है। जिसके लिए जनप्रतिनिधियों ने अपनी आवाज को बुलंद करना उचित नहीं समझा। इसकी एक मुख्य वजह जागरूक लोगों द्वारा हक की लड़ाई लडऩे की बजाय स्वार्थ की रोटी सेंकना भी रहा। जिसकी वजह से आदिवासी अंचल में रोजगार की असीम संभावनाएं होने के बाद भी ग्रामीण व शहरी इलाकों से बेरोजगारों का पलायन बढ़ता जा रहा है।
घर-घर गैस पहुंचाने की थी योजना
बताया गया है कि आज से १४-१५ साल पहले रिलायंस के सीबीएम प्रोजेक्ट के माध्यम से से आदिवासी अंचल में उद्योग धंधों की खोले जाने के साथ संभागीय मुख्यालय सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों में पाइप लाइन के जरिए घर-घर में गैस पहुंचाने की योजना बनाई गई थी और इसके लिए कंपनी द्वारा टेण्डर भी कॉल किया गया था, इसके बाद योजना का क्या हुआ? लोगों को पता नहीं चल पाया। गौरतलब है कि यदि आज पाइप लाइन के जरिए यदि गैस पहुंचाई जाती तो यहां के लोगों को सस्ती दर पर घरेलू गैस उपलब्ध होती, मगर ऐसा नहीं हुआ।
ठेकेदारी प्रथा हॉवी
जानकारों की माने तो आदिवासी अंचल के उद्योगों में ठेकेदारी प्रथा से कर्मचारियों को रखे जाने की प्रथा हॉवी है। जिससे कंपनियों को तो कर्मचारियों को नियमित करने व अन्य सरकारी नियमों की झंझट से मुक्ति मिल जाती है, मगर ठेका प्रथा के कर्मचारियों का जीवन अपने हक लड़ाई लडऩे में निकल जाता है और कर्मचारी अपने वास्तविक हक वंचित हो जाता है और उसके समक्ष हमेशा रोजी-रोटी की समस्या खड़ी रहती है। प्रबंधन भी उसे हमेशा नौकरी से निकाल देने की धमकी देकर उससे निर्धारित मापदंड से ज्यादा काम लेता रहता है।
इनका कहना है
स्थानीय स्तर पर आदिवासी अंचल के लोगों को रोजगार उपलब्ध करा पाना संभव इसलिए नहीं है कि यहां कोई उद्योग धंधे नहीं है और यही वजह है इस अंचल के लोग रुपया कमाने के लिए बाहर पलायन कर रहे हैं। हालांकि उन्हे शासन स्तर पर रोजगार दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किए जाते हैं।
सीमा वर्मा, जिला रोजगार अधिकारी, शहडोल
रासायनिक व बिजली फैक्ट्री लगाने के अब आधुनिक तकनीकी आ गई है और आधुनिक तकनीकी मीथेन गैस आधारित तकनीकी से बेहतर है। इसलिए मीथेन आधारित रासायनिक व बिजली फैक्ट्री नहीं लग रही है। घर-घर गैस पहुंचाने के लिए हमें बड़े शहरों की भांति नजदीक व घने घरों की आवश्यकता होती है और आदिवासी अंचल में ऐसा नहीं है। इसके बाद भी भविष्य में प्रयोग के तौर पर घर-घर गैस पहुंचाने की योजना पर काम किया जाएगा।
विजित झा, हेड कारप्रेड अफेयर, रिलांयस सीबीएम प्रोजेक्ट
Published on:
18 Oct 2018 08:47 pm
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