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शिशु-मातृ गोष्ठी में बताया- शिशु-वाटिका में गीत-संगीत, खेल, कहानी के माध्यम से शिक्षा

शिशुओं की उत्तरोत्तर प्रगति के लिए स्कूल में आयोजन

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In the infant-maternal gospel, education through songs, music, sports, story in child-Vatika

शिशु-मातृ गोष्ठी में बताया- शिशु-वाटिका में गीत-संगीत, खेल, कहानी के माध्यम से शिक्षा

शहडोल/ बुढार . स्थानीय सरस्वती उमा विद्यालय बुढ़ार में विद्याभारती शिशु वाटिका की योजनानुसार शिशुओं की उत्तरोत्तर प्रगति हेतु शिशु-मातृ गोष्ठी विद्यालय के विवेकानंद सभागार में उल्लास पूर्ण वातावरण में संपन्न हुई । कार्यक्रम का शुभारंभ मॉ वीणा पाणि सरस्वती जी का तिलक वंदन एवं उनके सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन कर उपस्थित अतिथियों द्वारा किया गया ।
मुख्य अतिथि की आसंदी पर समाज सेवी एवं पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष शालिनी सरावगी , कार्यक्रम की अध्यक्ष समिति सदस्य दिव्यांजली सराफ विशिष्ट अतिथि डॉ. रेखा शुक्ला एवं करूणा गुप्ता रहीं। मंचस्थ अतिथियों का परिचय प्रधानाचार्य मृगेन्द्र श्रीवास्तव द्वारा एवं स्वागत पुष्प गुच्छ भेंट कर विद्यालय की आचार्या कमला सोनी, सीता गुप्ता एवं विनीशा तिवारी द्वारा किया गया।
शिश्ुा-मातृ गोष्ठी की भूमिका प्रधानाचार्य द्वारा रखी गई एवं वरिष्ट आचार्या कमला सोनी द्वारा शिशु शिक्षण की विधाओ व व्यवस्थाओं पर प्रभावी विचार प्रगट किए गए। आपने बताया कि शिशु शिक्षा के लिए छात्रों की आयू 3 वर्ष से 5 वर्ष तक ही होनी चाहिए। शिशु-वाटिका में छात्रों को भयमुक्त, तनावरहित एवं आनंददायी शिक्षा प्रदान की जाती है। यह शिक्षा वार्तालाप , गीत-संगीत, खेल कहानी, अभिनय, हस्तकला, साज-सज्जा , श्लोक, मंत्र पाठ, बागवानी, योग , दैनिक जीवन व्यवहार एवं प्रयोग निरीक्षण आदि माध्यमों से दी जाती है। इस तरह की शिक्षा से छात्रों का समग्र विकास होता है। आपने सोलह संस्कारों का क्रमश: नाम बताते हुए उन सभी संस्कारों की विशेेषताओं का वर्णन भी किया ।
शिशु-वाटिका प्रमुख सीता गुप्ता ने शिशु कक्षा में कैसे और किस वातावरण में अध्ययन कराया जाता है इन सभी पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किए। आपने शिशु-वाटिका का अर्थ बताते हुए उनके बारह आयामों को बताया । शिशु-वाटिका की शिक्षा बस्ते के बोझ से रहित शिक्षा होती है। यहॉ चित्रों, विज्ञान प्रयोगशाला, वस्तु संग्रहालय, घर, चिडियाघर, कलाशाला, कार्यशाला, बगीचा, क्रीडांगन, तरणताल, प्रदर्शनी , रंगमंच आदि बारह आयामों के द्वारा शिक्षण पर बल दिया जाता है। आपने मातृ शक्तियों से आग्रह भी किया कि बच्चों में सुबह उठने की आदत डालें तथा उनके भोजन पर भी ध्यान दें । टिपिुन में ताजा एवं पौष्टिक भोजन रखकर विद्यालय भेंजें। आपने शिशु वटिका के अंतर्गत कार्यक्रमो वंदना सभा, मातृ सम्मेलन, समूह भोजन, मातृगोष्ठी, प्रथम दिनोत्सव, दादा-दादी सम्मेलन, जन्मदिन उत्सव, विद्यारंभ संस्कार, उत्सव एवं पर्व, पाटी पूजन, बालसभा, माताओं की प्रतियोगिता, शिशुमातृ संगम , संगीत सभा , नवदंपति सम्मेलन, वार्षिकोत्सव , खेलकूद समारोह , भ्रमण, वन संचार, बाल मेला ,शिशुनगरी एवं शोभा यात्रा की भी जानकारी दी। विद्यालय परिवार की ओर से विनीशा तिवारी ने कविता के माध्यम से बताया कि मातृशक्ति एक पालक के साथ-साथ बच्चे की प्रथम गुरू भी होती है।