-सोहागपुर विधानसभा से 2000 के उपचुनाव में थर्ड जेंडर उम्मीदवार ने सभी दलों के बिगाड़ दिए थे समीकरण -कांग्रेस के परिवारवाद और भाजपा की अंतर कलह की बदौलत निर्दलीय शबनम मौसी को मिला था बहुमत
शहडोल। देश व प्रदेश में विधानसभा व लोकसभा चुनाव में उलट-फेर होते रहे हैं। कई बार ऐसे भी मामले सामने आए हैं जो अविस्मरणीय रहे हैं। इनमें से एक शहडोल के सोहागपुर विधानसभा में वर्ष 2000 में हुए उपचुनाव के परिणाम भी है। इस उप चुनाव में भाजपा व कांग्रेस दोनो ही प्रमुख राजनैतिक दल के दिग्गजों को पछाड़कर निर्दलीय थडऱ्जेंडर उम्मीदवार ने बहुमत हासिल किया था। देेश के इतिहास में यह पहली बार हुआ था जब कोई थर्डजेंडऱ उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरकर बड़े अंतर के साथ जीत हासिल की थी। इसे थर्डजेंडर की राजनीति में भागीदारी की शुरुआत भी हुई थी। इसके बाद ही इन्हे समाज में एक स्थान मिला और राजनीति में थर्डजेंडर का दखल प्रारंभ हुआ।
दोनो दलों बराबर मिले थे वोट
जानकारों की माने तो वर्ष 1998 के विधानसभा चुनाव में सोहागपुर से कांग्रेस उम्मीदवार कृष्णपाल सिंह ने जीत हासिल की थी। इस दौरान उनका निधन हो गया और उपचुनाव कराना पड़ा। वर्ष 2000 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने कृष्णपाल सिंह के पुत्र बृजेश सिंह को चुनाव मैदान में उतारा था वहीं भाजपा की ओर से लल्लू सिंह प्रत्याशी रहे। इस चुनाव में थर्डजेंडऱ उम्मीदवार शबनम मौसी ने निर्दलीय चुनाव लड़ा था और भारी मतों से जीत भी दर्ज की थी। बताया जा रहा है कि इस उपचुनाव में भाजपा व कांग्रेस को मिलाकर जितने वोट मिले थे उससे ज्यादा वोट शबनम मौसी के पक्ष में पड़े थे।
परिवारवाद व एक ही चेहरे को लेकर थी नाराजगी
वर्ष 2000 में सोहागपुर विधानसभा में हुए उपचुनाव में आम नागरिकों के साथ ही दोनो ही दलों के नेताओं की नाराजगी का फायदा थर्डजेंडऱ उम्मीदवार शबनम मौसी को मिला था। जानकारों की माने तो कृष्णपाल सिंह के बाद उनके बेटे को टिकट मिलने से परिवारवाद को लेकर कांग्रेस पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं में नाराजगी थी। इसके अलावा भाजपा में कुछ दावेदारों में टिकट न मिलने को लेकर नाराजगी थी तो कुछ में एक ही चेहरे को बार-बार चुनाव मैदान में उतारने को लेकर रोष था। इसके अलावा आम मतदाता भी बदलाव चाहता था।
दो वर्ष का कार्यकाल, थर्ड जेंडऱ को मिली पहचान
इस उपचुनाव में शबनम मौसी ने देश की पहली थर्डजेंडऱ विधायक के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। उनका दो वर्ष का कार्यकाल रहा, इसके बाद वर्ष 2003 में फिर से विधानसभ चुनाव हुए। शबनम मौसी के विधायक बनने के साथ ही थर्डजेंडऱ को भी एक नई पहचान मिली। इसके बाद कई ऐसे अवसर आए जहां थर्डजेंडऱ ने अलग-अलग चुनावों में दावेदारी की।