
In this city of MP 32 hundred handicaps life depend on sticks
शहडोल। जिले में दिव्यांगो की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हर गली मोहल्लों में दिव्यांग लाठी के सहारे भीख मागते जिंदगी गुजार रहे है लेकिन संभागीय मुख्यालय में ट्राईसायकल और चश्मा बाटने के अलावा कोई दूसरे इलाज की सुविधा नहीं है। जिला चिकित्सालय भी प्लास्टर चढ़ाने तक सीमित है। नेत्र चिकित्सालय में तो कम्प्यूटराइज्ड जांच तक का इंतजाम नहीं है। क,ख,ग, पढ़वाकर यहां आंख की जांच हो रही है। 2011 में हुए दिव्यांगो के सर्वे के आकड़े ही जिले में भयावह है। यहां सात साल पहले हुए सर्वे में दिव्यांगों की सख्या 15 हजार ९ सौ 42 है। जिसमें अस्थि बाधित, नेत्र ज्योतिहीन और मानसिक दिव्यांगों की सख्या अधिक है। समय रहते दिव्यांगो के रोक थाम का चिकित्सकीय प्रबंध नहीं किए गए तो हालत और बिगड़ सकती है। वर्तमान में अगर सर्वे कराया जाए तो दिव्यांगों को आंकड़े 20 हजार पार भी हो सकते है। इन दिव्यांगो में जन्म के साथ-साथ कुपोषण भी आदिवासी क्षेत्र में बच्चों को दिव्यांग बना रहा है।
3200से ज्यादा ज्योतिहीन दिव्यांग
वर्षो पूर्व किए गए सर्वेक्षण में अकेले जिले में ३२ सौ से अधिक नेत्र ज्योति हीन दिव्यांग है। जिनसे ग्रामीण क्षेत्रों के साथ- साथ शहरी क्षेत्र भी शामिल है। जो लाठी के सहारे अभिशापित जीवन जी रहे है। इनमें किसी को भी शासन के सहयोग से नेत्र ज्योति नहीं मिल सकी है। जबकि अस्थि बाधित दिव्यांगों के लिए साल में शिविर का भी आयोजन हो जाता है। लेकिन नेत्र ज्योति हीनों के लिए एक पेंशन का सहारा है। इसके बाद भी नियमानुसार पांच साल में दिव्यांगो का सर्वेक्षण नहीं हो रहा है, जिससे लाभ से वंचित हैं।
कोख में ही हो जाते हैं अपंग
आदिवासी अंचलों में कुपोषण और एनीमिया भी विकलांगता का मुख्य कारण है। एनीमिया गर्भकाल में इतना ज्यादा प्रसूताओं पर असर डालता है कि बच्चे कोख में ही अपंग हो जाते हैं। डॉक्टर्स केे अनुसार पोषण आहार न मिलने और देखरेख के अभाव में गर्भ में ही बच्चों का पैर टेड़ा हो जाता है तो किसी का तालु फट जाता है। कुछ मासूम बचपन से ही श्रवणबाधिता का शिकार हो जाते हैं। स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड के अनुसार हर माह दस ऐसे बच्चों को चिहिंत किया जाता है। पिछले एक साल में स्वास्थ्य विभाग ने डेढ़ सौ बच्चों को चिहिंत किया है, जो जन्म से ही विकलांगता के शिकार थे।
Published on:
26 Aug 2018 08:42 pm

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