
आदिवासियों के सालभर के वजूद की पूंजी है महुआ फूल
शहडोल. जब सूरज की पहली किरण भी धरती को नहीं छूती, तब शहडोल के वनांचलों में टॉर्च की मद्धम रोशनी और टोकरियों में महुआ के फूल महकने लगते हैं। यहां के आदिवासियों के लिए यह उनके साल भर के वजूद की पूंजी है। तपते पारे के बीच गिरता महुआ का एक-एक फूल आदिवसियों के लिए पीला सोना है, जो उनके सूने पड़े खींसों (जेब) में खनक पैदा करता है।
शहडोल जिले में तापमान 32 डिग्री के पार पहुंच रहा है, लेकिन यह गर्मी आदिवासियों के इरादों को सुखा नहीं पा रही। डिरवरिया जैसे दूरस्थ अंचलों में आलम यह है कि परिवार का हर सदस्य—चाहे वह नन्हे हाथों वाला बच्चा हो या झुर्रियों भरे चेहरे वाला बुजुर्ग—सुबह 4 बजे ही जंगलों की ओर दौड़ पड़ता है। 16 से 18 डिग्री की कडकड़़ाती भोर में नींद का त्याग कर ये ग्रामीण महुआ के पेड़ों के नीचे अपनी किस्मत बीनते हैं। महुआ का गिरना यहां महज एक प्राकृतिक चक्र नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्राइमरी रेवेन्यू सोर्स है। यह वह नकदी है, जो साहूकारों के कर्ज से मुक्ति और घर के राशन का इंतजाम करती है।
ग्रामीणों के अनुसार, जितनी अधिक गर्मी पड़ती है, महुआ का फूल उतना ही अधिक झड़ता है। आसमान से बरसती आग उनके लिए वरदान बन जाती है। महुआ बीनने से पहले पेड़ों के नीचे की जमीन को जिस करीने से साफ किया जाता है, वह उनके काम के प्रति समर्पण को दर्शाता है। वे सुनिश्चित करते हैं कि पीला सोना मिट्टी में मिलकर अपनी चमक न खो दे। वह सुबह 4 बजे से जंगल की ओर रुख कर जाते हैं।
जंगलों के सन्नाटे में जब पत्रिका टीम ने इन ग्रामीणों से संवाद किया, तो उनकी बातों में थकान से ज्यादा उम्मीद दिखी। उनके लिए महुआ का झडऩा उत्सव है। यह वह समय है जब जंगल अपनी गोद खोलकर उन्हें साल भर की रोजी-रोटी सौंप देता है।
महुआ का फूल आदिवासियों के लिए केवल एक वनोपज नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक रीढ़ है। महुआ बेचकर ग्रामीणों को तुरंत नकद राशि प्राप्त होती है, जिससे वे शादी-ब्याह, बीमारी और साल भर के अन्य खर्चों का प्रबंधन करते हैं। शहडोल संभाग का महुआ अपनी उच्च गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है। खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों से लेकर औषधीय उपयोग और पारंपरिक पेय निर्माण तक, इसकी भारी मांग रहती है। जिस दौर में खेती अनिश्चित होती है, महुआ आदिवासियों के लिए बीमा की तरह काम करता है। महुआ का सीजन शुरू होते ही ग्रामीणों में उत्साह का माहौल रहता है और पूरे परिवार के साथ महुआ फूल बीनते हैं।
इनका कहना है
ग्रामीणों से हमारी अपील है कि महुआ बीनने के लिए पेड़ों के नीचे की घास साफ करने के बाद जो आग लगाते है, उसे अपने सामने ही बुझा दें, एक छोटी सी चिंगारी पूरे जंगल को राख कर सकती है और वन्यजीवों की जान जोखिम में डाल सकती है। हमारी टीमें गश्त कर रही हैं, वहीं ग्रामीणों के साथ इस सबंध में संवाद भी किया जा रहा है।
श्रद्धा पेन्द्रो, डीएफओ दक्षिण वन मंडल शहडोल
Published on:
13 Mar 2026 11:51 am
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