स्वेच्छा से दी जाने वाली राशि से ही वृद्ध महिलाएं करती हैं अपनी गुजर-बसर
शिवपुरी. कहते हैं कि जब उम्र ढलने लगे तो इंसान को भगवान की धुन में रम जाना चाहिए। वहीं इसके उलट कुछ वृद्ध महिलाएं ऐसी हैं जो भगवान की धुन में रमने के साथ ही आत्मनिर्भर भी बन गई हैं। आधा दर्जन वृद्धाओं की यह भजन मंडली न केवल नवरात्र पर मंदिरों में भजन करने जाती हैं, बल्कि लोग इन्हें अपने घर पर होने वाले कार्यक्रमों में भी आमंत्रित करते हैं। यह महिलाएं टीम के साथ भक्तिभाव से भजन करती हैं, तथा उन्हें बुलाने वाले जो भी राशि उन्हें देते हैं, वो आपस में बांट लेती हैं।
जिले के करैरा नगर में रहने वाली रती कुशवाह, गोमती बाई, रामकली, जानकी, झनिया व मनीषा ने अपनी मंडली बनाई। सभी महिलाएं 65 से 70 वर्ष की उम्र वर्ग की होने के साथ ही आपस में सहेली भी हैं। परिवार में लोग अधिक होने से जमीन के अधिक टुकड़े हो गए तो बच्चों को भी मेहनत-मजदूरी करनी पड़ रही है। ऐसे में इन महिलाओं ने खुद को व्यस्त रखने तथा दो पैसा कमाने के लिए भजन गाना शुरू किया और इसके लिए घर में रखी ढोलक, झांझर, मजीरा, टुनटुनी लेकर निकल पड़ीं। करैरा नगर ही नहीं आसपास के दूसरे गांव के लोग भी महिलाओं की इस भजन मंडली को अपने घर-परिवार या मंदिर आदि पर होने वाले धार्मिक आयोजनों में भजन गाने के लिए बुलाते हैं।
मंडली में शामिल रती कुशवाह का कहना है कि हम कभी पैसा तय करके भजन गाने नहीं जाते, बल्कि जिसकी जो श्रद्धा होती है, वो हमें पैसा देते हैं, जिसे हम लोग आपस में बांट लेते हैं। रती का कहना है कि इस बहाने हम लोग दिन भर भगवान को याद करते हैं और उनका नाम ही अपने मुंह से कई बार लेते हैं, जिससे हमें आत्मिक संतुष्टि भी मिलती है। रती ने बताया कि ढोलक-मजीरे सहित सभी वाद्य यंत्र हमारे ही हैं, हमें कहीं से यह मिले नहीं हैं।
घर की चिकचिक से दूर भगवान के साथ
महिलाओं का कहना है कि घर में रहते थे बहू-बेटा या अन्य सदस्यों से किसी न किसी बात पर चिकचिक होती रहती थी। अब हम सुबह से अपनी मंडली के साथ भजन-कीर्तन पर निकल जाते हैं, तो दिन भर भगवान को याद करते हैं और उनके सहारे से अपने खर्चे-पानी की व्यवस्था भी हो जाती है।