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#CAMPAIGN: खाली पदों में अटका बच्चों का भविष्य!, आप भी जानिए आखिर कैसे सुधरें हालात…

जिले के आंगनबाड़ी केंदों पर बच्चों को दी जाने वाले शाला पूर्व शिक्षा संकट में है।

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Vishwanath kumar Saini

Aug 08, 2017

सीकर. जिले के आंगनबाड़ी केंदों पर बच्चों को दी जाने वाले शाला पूर्व शिक्षा संकट में है। क्योंकि इनको पढ़ाई का अभ्यास कराने वाली महिला कार्मिकों के १३० पद पिछले लंबे समय से खाली चल रहे हैं। केंद्रों पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व सहायिका नहीं होने के कारण बच्चे आते हैं और टाइम पास कर वापस अपने घर चले जाते हैं। ना पढ़ाया जा रहा है, ना ही सुविधाओं का ध्यान रखा जा रहा है।

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खाली पदों का अम्बार


पिपराली में 52 कार्यकर्ता,30 सहायिका, दांतारामगढ़ में 6 सहायिका, फतेहपुर में दो कार्यकर्ता
खंडेला में 3 कार्यकर्ता व 9 सहायिका, नीमकाथाना में 5 कार्यकर्ता, 4 सहायिका, लक्ष्मणगढ़ में एक सहायिका, श्रीमाधोपुर में एक कार्यकर्ता, धोद में तीन कार्यकर्ता व तीन सहायिका, सीकर प्रथम में चार सहायिका व सीकर शहर द्वितीय में तीन सहायिका व एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता का पद रिक्त चल रहा है।

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पौष्टिकता के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति!


सीकर. सरकार एक तरफ तो कुपोषण मुक्त स्वस्थ प्रदेश के सपने दिखा रही है। दूसरी तरफ पौष्टिकता के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है। हकीकत यह है कि आंगनबाड़ी केंद्रों पर आने वाले बच्चों को गर्म पौष्टिक आहार देने के लिए सिर्फ साढ़े तीन रुपए का बजट दिया जा रहा है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि महज साढ़े तीन रुपए में किस प्रकार का पौष्टिक खाना बच्चों को परोसा जा रहा होगा। जानकारी के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्रों पर छह साल तक के बच्चों को गर्म पोषहार दिया जाता है। जिसके तहत प्रत्येक बच्चे को दलिया व खिचड़ी पकाकर खिलाई जाती है। मीन्यू के हिसाब से इनमें गुड़, चीनी, तेल, छिलके की दाल, मूंग की दाल **** कई पौष्टिक तत्व डालने होते हैं। यह गर्म पोषाहार स्वयं सहायता समूह ही तैयार कर आंगनबाड़ी केंद्र पर पहुंचाते हैं।


बदले में स्वयं सहायता समूह को एक बच्चे पर महिला एवं बाल विकास विभाग केवल साढ़े तीन रुपए का भुगतान होता है। जबकि समूह चलाने वाली कई महिलाओं का कहना है कि साढ़े तीन रुपए में तो एक नमक की थैली भी नहीं आती है। ऐसे में इतने कम पैसों में पौष्टिक आहार की थाली बच्चों के लिए तैयार करना संभव नहीं है। लेकिन, फिर भी कम मात्रा में सामग्री डालकर काम चलाना पड़ रहा है। बजट बढ़ाने के लिए कई बार विभाग के अधिकारियों को कहा जा चुका है। लेकिन, वे व्यवस्था आगे से संचालित होने का हवाला देकर मामले को हर बार टाल देते हैं।