
रियो में विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचने वाले एथलीट देवेन्द्र झाझडिय़ा को अपनी माटी से बेहद लगाव है। यही वजह है कि 12 साल पहले एथेन्स पेराओलम्पिक 2004 में पदक जीतने के बाद इग्लैण्ड सरकार ने देवेन्द्र झाझडि़या को ग्रीन कार्ड देने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया था कि 'मैं मरते दम तक भारत और राजस्थान की माटी का मान नहीं भूल सकता हूं। इसलिए खेलूंगा तो भारत की ही जर्सी पहनकर'।
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बकौल, झाझडि़या भारत की जर्सी में वो दम है जो पहनते ही देशभक्ति जज्बा भर देता है। इसके बाद हरियाणा सरकार ने भी झाझडि़या को भविष्य में हरियाणा से खेलने पर पुलिस अधिकारी का पद देने का प्रस्ताव दिया था।
लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था। कहा था कि राजस्थान की मिट्टी में पला-बढ़ा हूं। यहां की माटी को छोडऩा मेरे बस में नहीं है।
इस बार भी हैप्पी मंगलवार
खेलों की दुनिया में इस बार भी झाझडिय़ा के लिए हैप्पी मंगलवार रहा। बकौल देवेन्द्र की पत्नी मंजू जब-जब मैच मंगलवार को हुए तब-तब उन्होंने देश को सोना जिताया है। वह बताती है कि भाला फेंक स्टेन्थ, स्टेमिना का खेल है। बचपन से मैंने यही सुना कि ताकत मांगनी है तो बालाजी से मांगे।
इसलिए शादी के बाद से पति के लिए मंगलवार का व्रत करती हूं। 2003 में ब्रिटिश ओपन चैम्पियनशिप में जेवेलियन में स्वर्ण व 2004 के एथेंस पैरा ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीता था।
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2006 में मलेशिया में हुई पैरा एशियन गेम्स, 9 वें पैरा एशियन, 2007 ताइवान में पैरावल्र्ड गेम्स में सोना जीता तो उस दिन भी मंगलवार था।
Published on:
15 Sept 2016 05:45 pm
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