
सीकर. इसे हमारी लापरवाही कहें या अनदेखी कि घरों में रखी बची हुई दवाएं धीमा जहर साबित हो रही है। चिकित्सक की ओर से लिखी गई दवाओं के उपयोग के बाद बची ये दवाएं जागरुकता का अभाव में घर- परिवार के लोगों के लिए जानलेवा हो सकती है। इन दवाओं के निपटारे की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण ये दवाएं या तो अलमारी में सड़ती हैं या फिर सीधे कचरे में फेंक दी जाती हैं। चिकित्सकों के अनुसार शहर से गांव तक हर घर में पड़ी बची दवाएं अब इलाज नहीं अनजानी बीमारी का नया स्रोत बनती जा रही हैं। कई बार तो व्यस्कों की दवा बच्चों को देने से जान पर बन आती है। आंकड़ों के अनुसार पांच सदस्यों वाला एक औसत परिवार सालभर में 12 से 15 तरह की दवाएं खरीदता है। इनमें अक्सर 25 से 30 प्रतिशत दवाएं बिना उपयोग के बच जाती हैं। लोगों के अनुसार मौजूदा दौर में प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण औसतन 40 से 50 टेबलेट एक साल में बिना उपयोग के हर घर में बेकार पड़ी रहती है। जिन्हें साफ-सफाई के दौरान कचरे में फेंक दिया जाता है। जानकारों के अनुसार लोगों को अनजानी बीमारियों से बचाना है तो इन अनुपयोगी दवाओं का सही तरीके से इस्तेमाल होना बेहद जरूरी है।
चिकित्सकों के अनुसार किसी दवा की प्रभावशीलता उसकी समाप्ति तिथि पर निर्भर करती है, और यही कारण है कि पैकेटों पर समाप्ति तिथि अंकित होती है। समाप्ति तिथि को स्पष्ट रंग और फ़ॉन्ट में लिखा जाता है जिससे उपभोक्ता को आसानी से समझ आ सके। प्रत्येक दवा की शेल्फ लाइफ तापमान, प्रकाश और नमी पर भी निर्भर करती है। अक्सर घरों में बीमार होने पर चिकित्सकों की सलाह पर दवा तो ले जाती है दवा लेते समय रेपर को फाड़ने या आलमारी या दराज में पड़े रहने से दवाओं की एक्सपायरी तिथि धुंधली हो जाती है या कई बार वहां से दवा का रैपर भी फट जाता है। जिससे दवा की सही एक्सापयरी तिथि पता नहीं चल पाती है। दवाओं की समाप्ति तिथि के बाद उनका असर कम होने लगता है।
घर में पड़ी पुरानी दवाएं बच्चे गलती से खा लेते हैं।अधूरी खुराक से एंटीबायोटिक बेअसर हो रही हैं, जिससे इलाज महंगा और लंबा होता जा रहा है। नालियों में बहाई गई दवाएं पानी को जहरीला बना रही हैं। कचरे के साथ फेंकी गई दवाएं अक्सर गाय, कुत्ते और अन्य पशु खा लेते हैं। इनके सेवन से पशुओं के लीवर और किडनी को नुकसान पहुंचाती हैं।
चिकित्सकों के अनुसार बची हुई दवाओं के लिए प्रत्येक अस्पताल या दवा की दुकान पर मेडिसिन ड्रॉप बाक्स हो। जहां दवाएं रखी जा सके। एक्सपायरी दवाओं को सामान्य कचरे के साथ नहीं रखें। यही कारण है कि इलाज की गोलियां अब बीमारी की वजह बनें, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी अगर अब भी व्यवस्था नहीं बनी, तो यह संकट कूड़े से उठकर अस्पतालों तक लौट आएगा।
बची हुई आधी दवाई का दोबारा उपयोग या लापरवाही से फेंकना एक छोटी गलती नहीं है। यह परिवार, समाज और पर्यावरण – तीनों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। कई लोग बची हुई दवाइयां सीधे कूड़े में फेंक देते हैं। पशु या पालतू जानवर इन्हें खा लेते हैं, जिससे शरीर के कई अंगों को नुकसान होता है यहां तक की कई बार संबंधित की अकाल मौत भी हो जाती है। इसके अलावा हर व्यक्ति की बीमारी, उम्र, वजन और स्वास्थ्य स्थिति अलग होती है। जो दवा एक व्यक्ति के लिए सही है, वह दूसरे के लिए नुकसानदायक हो सकती है। गलत दवा से एलर्जी या गंभीर रिएक्शन हो सकता है। एंटीबायोटिक का गलत उपयोग शरीर में दवा प्रतिरोध (रेज़िस्टेंस) बढ़ाता है। इससे बीमारी के लक्षण दब सकते हैं और असली बीमारी की पहचान देरी से होती है।
डॉ मनोज चौधरी, फिजिशियन एवं क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट
यह बात सही है कि अक्सर घरों में उपयोग के बाद कई दवाएं बच जाती है। इनमें कई दवाइयों की पुरानी थैलियों पर छपी एक्सपायरी डेट अक्सर मिट जाती है। इससे खतरनाक दुर्घटना हो सकती है। एक्सपायरी डेट के बाद इन दवा का सेवन करने से जानलेवा असर पड़ता हैं। इस संबंध में बेहद सावधानी बरतनी चाहिए।
डॉ. दर्शन भार्गव, फिजिशियन, मेडिकल कॉलेज सीकर
Updated on:
17 Feb 2026 12:00 pm
Published on:
17 Feb 2026 12:00 pm
