
किसानों की हुंकार...झुक जाती है सरकार,किसानों की हुंकार...झुक जाती है सरकार
अनुशासन और रणनीति से सरकार को झुकाने का जज्बा शेखावाटी के किसान तय करते हैं देश में आंदोलन की दिशा
भूमिपुत्रों के हक के लिए देश में होने वाले आंदोलनों की दिशा और जीत में शेखावाटी के किसानों की भूमिका अहम रही है। यही कारण है कि देश के किसी भी कोने में होने वाले आंदोलन में यहां के किसान की अहम भूमिका मानी जाती है। पचास डिग्री तक गर्मी और जमाव बिन्दू से नीचे के तापमान को सहने वाला सीकर के किसान ने अपने हक के लिए घर-बार छोड़ कर जब-जब आंदोलन की राह पकड़ी है वे आंदोलन पूरी तरह सफल हुए हैं। किसानों की अपनी ललकार से सरकार तक को झुकना पड़ा। चाहे वो जयपुर में महापड़ाव हो या सीकर से जयपुर तक रैली के जरिए जाना हो। किसान नेताओं की माने तो इन सभी आंदोलनों की सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण शेखावाटी के किसानों की सोच का विस्तृत होना, अनुशासन और एक-दूसरे पर भरोसा होना रहा है। इस कारण यहां का किसान मौजूदा परिस्थितियों के अलावा विपरीत हालात का डटकर मुकाबला करता है और इस कारण सत्ता के गलियारों में हड़कम्प मच जाता है।
विधानसभा को घेरा
प्रदेश में वर्ष 2000 में बिजली बिलो के ज्यादा आने के विरोध में एक फिर किसानों ने हुंकार भरी और वे गांव व ढाणियों से कूच करके सीधे जयपुर की विधानसभा में पहुंच गए। उस समय विधानसभा भी चल रही थी। ऐसे में किसानों ने विधानसभा के चारों गेट को बंद किया और गेट के बाहर की धरने पर बैठे। चार घंटे की जद्दोजहद के बाद सरकार के मंत्री आए और उन्होने किसानों की मांगों को पूरा किया। इसके बाद ही आंदोलनरत किसान वहां से हटे।
हुकांर से हिले हुक्मरान
वर्ष 2005 में बिजली की दरों को बढ़ाने के बाद किसानों के सामने बिजली के बिल चुकाना तक मुश्किल हो गया। ऐसे में किसानो ने जयपुर में अमरूदों के बाग में पड़ाव दिया तो राजधानी में चारों तरफ किसानों के समूह नजर आने लगे तो सत्ता के गलियारों में हलचल मच गई। किसी तरह का आश्वासन नहीं मिलने के बाद किसानों ने जब तत्कालीन सीएम के आवास पर पड़ाव देने की घोषणा की तो फौरन सरकार झुकी और दरों को वापस लेने के आदेश दिए।
कूच से पहले ही बैकफुट पर
वर्ष 2016 में बुवाई के समय बिजली आपूर्ति घटाने के विरोध में किसान परिवार सहित आंदोलन में कूद पड़े। इसके बाद किसानों के समूहो ने प्रत्येक पावर हाउस के बाहर धरना दिया और आक्रोश जताया। बाद में जब किसान नेताओं ने जयपुर के लिए कूच की घोषणा की तो कूच करने से दस दिन पहले ही सरकार ने बिजली की बढ़ाई दरों को वापस लेने के आदेश दिए।
सत्ता के गलियारों में हडकम्प मचा
केन्द्र के तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर पंजाब, हरियाणा सहित देश के कई राज्यों के किसान जुटे लेकिन जैसे ही शेखावाटी के किसानों ने सड़क पर बैठकर धरना देना शुरू किया तो सत्ता के गलियारों में हडकम्प मच गया। और संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले अप्रत्याशित जीत हुई।
प्रमुख किसान आंदोलन
बूंदी किसान आंदोलन (बूंदी)
अत्यधिक लगान, लाग बाग और बेगार प्रथा के विरोध में वर्ष 1926 में हुआ बूंदी किसान आंदोलन बरड़ किसान आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। डाबी में नैनूराम शर्मा के नेतृत्व में हो रहे किसान सम्मेलन पर भी पुलिस की गोलियां चली, जिसमें नानक भील की मौत हो गई। यह 1943 में समाप्त हुआ।
सीकर मंडी में दिया पड़ाव
किसानों की कर्जमाफी की मांग को लेकर किसानों ने सीकर में आंदोलन किया गया। जिसमें किसानो ने 13 दिन तक जयपुर रोड स्थित कृषि मंडी में पड़ाव दिया। तीन दिन तक चक्काजाम किया। कई किसानो को जेल भी जाना पड़ा और प्रशासन ने राजमार्ग जाम करने पर मुकदमे भी दर्ज किए लेकिन किसान पीछे नहीं हटे, जिसके कारण न केवल शेखावाटी प्रदेश के अन्य जिले भी प्रभावित रहे। इसके बाद सरकार ने प्रदेश में आठ हजार करोड़ रुपए के कर्ज की माफी की घोषणा की। यहां के आंदोलन का ही नतीजा रहा कि महाराष्ट्र के किसानो ने नासिक से मुम्बई तक पैदल गए और बाद में उनकी मांगे मानी गई। सीकर में 1979-80 में फसलों का सही मूल्य व मुआवजे की मांग को लेकर किसानों ने जेल भरो आंदोलन शुरू किया था। सीकर की धर्मशालाओं को अस्थायी जेल बनाया गया था। इस आंदोलन में एक किसान की मौत हुई थी।
नीमूचणा किसान आंदोलन (अलवर)
अलवर के नीमूचणा में वर्ष 1923 से दूसरा किसान आंदोलन हुआ। अलवर के तत्कालीन महाराजा जयसिंह द्वारा लगान की दर बढ़ाना इस आंदोलन की वजह बना। गांवी नीमूचणा में किसानों की सभा पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाई थी, जिसमें सैकड़ों किसानों की मौत हुई थी।
मेव किसान आंदोलन (अलवर-भरतपुर)
लगान के विरोध में मोहम्मद अली के नेतृत्व में यह आंदोलन वर्ष 1931 में अलवर व भरतपुर में हुआ। यह क्षेत्र मेव बाहुल्य
होने के कारण इसे मेवात कहते हैं।
बिजौलिया किसान आंदोलन (भीलवाड़ा)
बिजौलिया में यह आंदोलन वर्ष 1897 से 1941 तक चला। आंदोलन की शुरुआत साधु सीतारामदास, नानकजी पटेल व ठाकरी पटेल के नेतृत्व में हुई थी। इसकी वजह लागबांग, बेगार, लाटा, कुंता व चंवरी कर, तलवार बंधाई कर आदि था। इस आंदोलन का जनक विजय सिंह पथिक को कहा जाता है। इनके अलावा माणिक्यलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय तथा जमनालाल बजाज ने भी इस आंदोलन की बागड़ोर संभाली। माणिक्यलाल वर्मा व मेवाड़ रियासत के प्रधानमंत्री टी.राघवाचार्य के बीच समझौता हुआ और किसानों की अधिकांश मांग मान ली गई।
सुअरपालन विरोधी आंदोलन (अलवर)
अलवर में दो किसान आंदोलन हुए। वर्ष 1921 में हुआ सुअरपालन विरोधी आंदोलन पहला था। इसकी वजह यह थी कि बाड़ों में पाले जाने वाले ***** द्वारा फसल को नष्ट करना था। उस वक्त सरकार की तरफ से सुअरों को मारने पर पाबंदी थी। किसानों ने विरोध में आंदोलन किया था। आखिर में सरकार ने सुअरों को मारने की इजाजत दी, तब आंदोलन समाप्त हुआ।
शेखावाटी किसान आंदोलन (सीकर)
वर्ष 1925 में शेखावाटी किसान आंदोलन हुआ। इस आंदोलन का ज्यादा असर गांव कुंदन, कटराथल, खुड़ी व पलथाना में था। कुंदन, भठोठड़ा व खुड़ी पुलिस गोलीकांड में कई किसानों की मौत हुई थी। आंदोलन आजादी से एक साल पहले हीरालाल शास्त्री के जरिए समाप्त हुआ। इतिहासकार महावीर पुरोहित के अनुसार सीकर में 1979-80 में फसलों का सही मूल्य व मुआवजे की मांग को लेकर किसानों ने जेल भरो आंदोलन शुरू किया था। सीकर की धर्मशालाओं को अस्थायी जेल बनाया गया था। इस आंदोलन में एक किसान की मौत हुई थी।
दूधवा-खारा किसान आंदोलन (चूरू)
दूधवा खारा गांव चूरू जिले में है। यहां पर वर्ष 1946-47 किसान आंदोलन हुआ। उस वक्त चूरू बीकानेर रियासत का हिस्सा हुआ करता था और किसानों पर जमीदारों के अत्यधिक अत्याचार होते थे। हनुमानसिंह आर्य, रघुवरदयाल गोयल, वैद्य मघाराम आदि के नेतृत्व में यह आंदोलन किया गया था।
Updated on:
01 Jan 2023 12:40 pm
Published on:
01 Jan 2023 12:37 pm

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