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गोटा उद्योग कभी खंडेला की पहचान होती थी

संरक्षण के अभाव दम तोड़ रहा

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गोटा उद्योग कभी खंडेला की पहचान होती थी

गोटा उद्योग कभी खंडेला की पहचान होती थी

जनार्दन शर्मा . खंडेला. कभी खंडेला की पहचान करवाने वाला गोटा उद्योग अब संरक्षण का अभाव होने से बंद होने की कगार पर है। गोटा उद्योग व ऊंचे पहाड़ों से कभी खंडेला की अपनी एक अलग पहचान थी, लेकिन सरकारी संरक्षण के असहयोगात्मक रवैये ने उद्योग को चौपट कर दिया। दस दशक पूर्व शुरू किया गोटा उद्योग अब दम तोड़ता जा रहा है। बताया जाता है कि लगभग सौ वर्ष पूर्व यहां के नजीर बिसायती ने शहर से गोटा लाकर बेचना शुरू किया था। फिर उन्होंने बाजार से एक गोटा मशीन लाकर गोटे का उत्पादन शुरू किया। इसके बाद यहां धीरे-धीरे मशीनों की संख्या बढऩे लगी।
एक व्यक्ति 8 से 10 मशीन आराम से चला सकता था। इस तरह धीरे-धीरे कस्बे की 80 फीसदी आबादी इस उद्योग से जुड़ गई और यहां तैयार होने वाला फूल, बिजिया, चटाई, आकड़ा, लहर, प्लेन, गोटा चरखी, किरण का फूल, स्टार फूल व पत्ती सहित अनेक प्रकार का गोटा राजस्थान के अलावा दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, गुजरात के सूरत, उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों के बड़े शहरों में जाता था।
गोटे के रूप व डिजाइन में आये बदलाव, जरी का काम बढऩे व सरकार की ओर से उन्हें सहायता व नई तकनीक की जानकारी नहीं देने के कारण यह उद्योग अब बंद होने के कगार पर है। गोटा व्यापार संघ ने उद्योग को जीवित रखने के लिए खूब प्रयास किए पर असफल रहे। अधिकांश मशीने अब कबाड़ हो गई हैं। लोगों ने बिजली के व्यावसायिक कनेक्शनों को या तो हटा दिया या फिर उन्हें घरेलू में बदलवा लिया है। पहले जहां दस से पन्द्रह हजार मशीनें चला करती थी अब उनकी संख्या घटकर महज सौ के आस-पास रह गई। वर्तमान में कस्बे के व्यापारी सूरत से गोटा लाकर बेच रहे है जबकि कभी यहां से गोटा सूरत जाया करता था।
मुख्यत: ये रहे कारण बंदी के
गोटा उद्योग का बंद होने के कगार पर पहुंचने का मुख्य कारण प्रशिक्षित कारीगरों की कमी तथा नई तकनीक की जानकारी नहीं होना रहा। दिन प्रतिदिन आने वाली नई डिजाइनों की जानकारी भी इन्हें नहीं मिली। इसके अलावा गोटे को उत्पादन के बाद निर्यात नहीं होना भी रहा। क्षेत्र में बिजली की कमी रही। साथ ही इन मशीनों को चलाने के लिए बिजली की दर व्यवसायिक लगी वो दर ये वहन नहीं कर पा रहे थे।
इस तरह बंद होने से रोका जा सकता है
दिन प्रतिदिन आने वाली नई नई डिजाइनों व तकनीक के लिए इनके प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये जाये। सरकार द्वारा अनुदान दिया जाए। इसके अलावा इन मशीनों पर बिजली की दर व्यवसायिक न लगाकर न्युनतम दर लगाई जावे। उत्पादन के बाद निर्यात की पूर्ण व्यवस्था की जावे।

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