
जोगेन्द्र सिंह गौड़ सीकर. मजदूरी कर बेटी को खेल की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का जिम्मा एक पिता ने बखूबी निभाया है। दिन रात मेहनत कर लोगों का बोझा उठाया। ताकि कमाई से बेटी को खेल का अच्छा प्रशिक्षण दिला सके। आखिरकार मजदूर पिता का सपना हकीकत में बदला और बेटी का चयन दौड़ की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हो गया। जिसके कारण अब यह लाडो जनवरी में गोवा में होने वाली ऑल इंडिया नेशनल क्रॉस कंट्री की दस किलोमीटर की दौड़ में शामिल होगी। जिसके लिए धाविका बिटिया प्रतिदिन छह घंटे का नियमित अभ्यास कर उडऩपरी बनी हुई है।
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जी हां, हम बात कर रहे हैं सीकर जिले के खंडेला इलाके की बाधवाड़ी की रहने वाली प्रियंका स्वामी की। जिसके पिता रामप्रसाद महज इसलिए जयपुर में रहकर मजदूरी कर रहे हैं। ताकि उनकी लाडली बेटी को खेल के साथ शिक्षा अच्छी शिक्षा ग्रहण करवा सकें। बतौर खिलाड़ी प्रियंका का कहना है कि बचपन से उसे एथेलेटिक्स बनने का शौक रहा है। लेकिन, गांव में अच्छे कोच व खेल सुविधाओं का अभाव होने के कारण अच्छी खिलाड़ी बनाने के लिए पिता ने गांव छोड़ दिया और जयपुर आकर मजूदरी करने लगे। मेहनताने के जो पैसे उन्हें मिलते।
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उनसे वे उसके लिए खेल सामग्री जुटा लाते और बाकी के रुपए खेल की ट्रेनिग पर खर्च कर देते हैं। हालांकि पिता के कारण यहां तैयारी कर स्कूली राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में तीन बार पहुंच चुकी हूं। लेकिन, अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा दिखाने का मौका मिला है। कड़ा अभ्यास कर पिता के खून-पसीने की कमाई को जाया नहीं जाने दूंगी। दौड़ की बाधा को पार कर उनकी झोली में मेडल डालने का ख्वाब पूरा करुंगी।
चूल्हे-चौके से रखा दूर
प्रियंका की मां भी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है। लेकिन, बेटी की मेहनत की अहमियत को समझती थी। दौड़ के अभ्यास में खलल नहीं पड़े। इसके लिए उसने प्रियंका को कभी चूल्हे-चौके में नहीं उलझाया। बल्कि जब भी बेटी दौड़ कर आती तो वह उसके लिए चाय या दूध का गिलास रखती थी। परिवार का मानना है कि रिश्तेदारी में दूर-दूर तक कोई खेल से जुड़ा नहीं होने के कारण मानस बनाया कि वह अपनी बेटी को एक दिन बड़ा खिलाड़ी बनाकर ही मानेंगे।
रिटायर फौजी आए आगे
हेल्थ एंड हैपीनेस काउंसिल के निदेशक श्रीराम पिलानयिा का कहना है कि प्रियंका को दौड़ का अभ्यास कराने के लिए तीनों सेनाओं के सेवानिवृत कोच गोविंद ङ्क्षसह ने हां भर रखी है। इसके अलावा ग्राउंड व रहने की व्यवस्था हम फौजी मिलकर उठाने के लिए तैयार है।
धाविका लेने आते हैं टिप्स
अपने गांव लौटने पर इस धाविका के पास कई खिलाड़ी भी दौड़ में सफलता हासिल करने के लिए टिप्स लेने पहुंच जाते हैं। हालांकि कमजोर स्थिति के कारण कई बार इस बेटी ने छात्रावास में रहने वाली बालिकाओं की खेल क्लास भी ली है।
Published on:
12 Dec 2017 12:02 pm

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