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बड़े-बड़े पोस्टर, बैनर, बिल्ले …अब वो बात कहां? …16 वर्ष तक सभापति रहने वाले सोमनाथ त्रिहन ने बताया…‘ये उन दिनों की बात है’

नगर परिषद चुनाव में अब बदल गया परिदृश्य। ढूंढने से ही मिलते पोस्टर, बैनर और बिल्ले।

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सीकर

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Gaurav Saxena

Nov 13, 2019

बड़े-बड़े पोस्टर, बैनर, बिल्ले ...अब वो बात कहां? ...16 वर्ष तक सभापति रहने वाले सोमनाथ त्रिहन ने बताया...‘ये उन दिनों की बात है’

बड़े-बड़े पोस्टर, बैनर, बिल्ले ...अब वो बात कहां? ...16 वर्ष तक सभापति रहने वाले सोमनाथ त्रिहन ने बताया...‘ये उन दिनों की बात है’

सीकर. ना कोई पोस्टर, बैनर और धूम-धड़ाका। समूह में वोट मांगने जाते। रास्ते में सामने वाली पार्टी का उम्मीदवार मिलता तो उसे भी पूरी इज्जत देते। लेकिन अब सब बदल गया है। नगर परिषद में 16 वर्ष तक सभापति रहे सोमनाथ त्रिहन अपने जमाने के चुनाव को याद करते हुए कहते हैं सब बदल गया है। प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनाव प्रचार तक। पहले विकास के कार्य जनता सहभागिता से तय होते थे। इसका प्रमुख उदाहरण शहर की सडक़ों का नामकरण है।

निर्माण सामग्री पर सडक़ों का किया नामकरण
नगर परिषद के पास बजट की कमी थी। राव राजा ने इंग्लैंड से सडक़ निर्माण के लिए रोलर मंगवा दिया। सडक़ बनाने के लिए परिषद ने सहभागिता की योजना शुरू की। त्रिहन बताते हैं कि जिनसे सडक़ निर्माण के लिए गिट्टी व अन्य सामग्री उपलब्ध करवाई। उसी के नाम पर सडक़ का नामकरण कर दिया गया। शहर की सेठ नूर मोहम्मद रोड, बिदावत का मार्ग, विनायक्या मार्ग, दीन मोहम्मद रोड सहित 9 सडक़ें उस दौरान इस योजना में बनाई गई थी। खास बात यह है कि सडक़ निर्माण के लिए किसी से भी परिषद ने पैसा नहीं लिया। निर्माण सामग्री मौके पर ही डलवाई जाती थी।
आधा थाना, आधी परिषद
नगर परिषद के पुराने भवन के आधे हिस्से में पहले सदर थाना चलता था। आधे भवन में नगर परिषद का कार्य चलता था। सन 1944 में स्थापित हुई सीकर नगर पालिका 50 हजार की आबादी होने पर 1961 में नगर परिषद हो गई। उस दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडिय़ा सीकर आए थ। कार्यक्रम के बाद बोर्ड के आग्रह पर सुखाडिय़ा ने छह माह में दूसरे स्थान पर थाना बनवाने का आश्वासन दिया। ऐसे में राव राजा ने भवन का शेष हिस्सा परिषद को दे दिया।
श्रमदान का बड़ा उदाहरण श्रमदान मार्ग
सीकर में कल्याण अस्पताल के पीछे बना श्रमदान मार्ग शहर के लोगों के श्रमदान का बड़ा उदाहरण है। इस सडक़ का निर्माण श्रमदान से किया गया था। त्रिहन बताते हैं कि उस जमाने के पार्षद जगदीश त्रिपाठी, हरिराम बहड़, श्यामलाल बिदावतका, सूरजमल जोशी, कैलाश नारायण स्वामी सहित कार्यकर्ता प्रतिदिन श्रमदान करते थे। इसके अलावा भी प्रतिवर्ष श्रमदान के कार्यक्रम होते थे। शहर कोतवाली के दो कमरे पास ही स्थित एतिहासिक बावड़ी में गिर गए थे। ऐसे में लोगों को स्नान और जल चढ़ाने में लोगों को परेशानी होने लगी। शहर के लोगों ने एक माह तक श्रमदान का अभियान चलाकर मलबा बाहर निकाल दिया।

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