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भारत के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार हो सकती हैं ऊर्जा-कुशल इमारतें

जलवायु परिवर्तन से आने वाले समय में रात के समय के तापमान में वृद्धि और अनियमित वर्षा सहित इमारतों को ठंडा रखने की आवश्यकताओं में बढ़ोतरी की आशंका है। इससे 2050 तक इमारतों की ऊर्जा खपत में आठ गुना वृद्धि होगी। ऐसे में देश को ऐसी इमारतों के निर्माण पर ध्यान देने की जरूरत है जिससे ऊर्जा उपयोग को कम किया जा सके।

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जयपुर

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Kiran Kaur

Oct 04, 2023

भारत के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार हो सकती हैं ऊर्जा-कुशल इमारतें

भारत के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार हो सकती हैं ऊर्जा-कुशल इमारतें

नई दिल्ली। ऊर्जा-कुशल इमारतें भारत के लिए 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में मददगार हो सकती हैं। भवन निर्माण क्षेत्र देश के ऊर्जा संबंधित उत्सर्जन का 20 फीसदी और ऊर्जा खपत के 33 फीसदी के लिए जिम्मेदार है। 2030 तक भारत में इमारतों के चार गुना बढ़ने का अनुमान है। लेकिन जलवायु परिवर्तन से आने वाले समय में रात के समय के तापमान में वृद्धि और अनियमित वर्षा सहित इमारतों को ठंडा रखने की आवश्यकताओं में बढ़ोतरी की आशंका है। इससे 2050 तक इमारतों की ऊर्जा खपत में आठ गुना वृद्धि होगी। ऐसे में देश को ऐसी इमारतों के निर्माण पर ध्यान देने की जरूरत है जिससे ऊर्जा उपयोग को कम किया जा सके।

उच्च लागत और जागरुकता कमी बड़ी बाधक:

भारत, विश्व में तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। भले ही यहां प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम हो लेकिन यह 2000 के बाद से वैश्विक ऊर्जा मांग में 10 फीसदी से अधिक की वृद्धि के लिए जिम्मेदार है। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक टिकाऊ निर्माण और कुशल उपयोग से ऊर्जा उपयोग और ग्रीनहाउस उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। ऊर्जा-कुशल इमारतें न केवल एनर्जी की मांग को कम करेंगी, बल्कि लोगों की सेहत, सुरक्षा और जल संरक्षण जैसी आवश्यकताओं को पूरा करने में उपयोगी साबित होंगी। लेकिन ऐसे निर्माण की उच्च लागत, जागरुकता का अभाव और खराब योजनाएं इसमें बाधक बनती हैं।

कांच की लोकप्रियता ने बढ़ाया उत्सर्जन:

देश में परिचालन उत्सर्जन (इमारतों को ठंडा, गर्म और हवादार रखने के साथ-साथ उसमें रोशनी आदि के लिए लगने वाली ऊर्जा) इमारतों के कुल उत्सर्जन का 60 फीसदी है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह 76 प्रतिशत है। देश में भवनों के निर्माण में हमेशा से जलवायु को केंद्र में रखा जाता था लेकिन अब इमारतों में कांच अधिक लोकप्रिय हो गया है। प्राकृतिक रोशनी आने की वजह से इसे पसंद किया जाता है लेकिन यह इमारतों में हीट को ट्रैप कर लेता है। ऐसे में इमारत को ठंडा रखने के लिए अधिक ऊर्जा की खपत होती है। जरूरी है कि नई और मौजूदा इमारतों की ऊर्जा दक्षता को बढ़ाया जाए क्यूंकि इससे प्रदूषण में भी कमी की जा सकती है।

भविष्य के खतरों से बचने के लिए यह निर्माण जरूरी:

भारत का निर्माण क्षेत्र, देश की कुल वार्षिक प्राथमिक ऊर्जा का 37 फीसदी उपभोग करता है, जो प्रभावी ऊर्जा-कुशल उपायों के अभाव में आठ गुना से अधिक बढऩे की आशंका है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार अगर इमारतों को अधिक कुशल बनाया जाता है और हवा की आवाजाही सीमित हो, तो भी बाहरी वायु प्रदूषण कारक जैसे जंगल की आग का धुआं या अन्य प्रदूषक तत्व आदि घर के अंदर कम हो जाएंगे। पर्यावरण के लिए उपयोगी इमारतों का निर्माण इसलिए भी जरूरी है क्योंकि 2050 तक विश्व में 37 फीसदी ऊर्जा की मांग इमारतों या घरों को ठंडा रखने के लिए होगी। एक चौथाई मांग घरेलू उपकरणों को चलाने और 12 प्रतिशत घर को गर्म करने के लिए की जाएगी।

विश्व में बढ़ती इमारतें