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कविता-सिर झुकाना छोड़ दो

Hindi poem

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कविता-सिर झुकाना छोड़ दो

कविता-सिर झुकाना छोड़ दो

आदिज्योति बाजपेई

तर्क खुद से मत करो, व्यवधान होगा
कल्पना में सत्य पाना छोड़ दो !

रक्त के आंसू बहे हैं
नित्य दृग के कोर से,
पृष्ठ संख्या में गढ़े हैं
हर दिशा की ओर से ,
मत विकल्पों से डरो, निष्कर्ष होगा
तीक्ष्ण घावों से डराना छोड़ दो!

श्वास का होगा वरण तब
फिर ज्वलित होगी प्रभा ,
और धर भी मुक्त होगी
तिमिर - चुम्बन राग से,
ले चलो अवरोध सा, परिणाम होगा
दांव पर जीवन लगाना छोड दो!

क्षेत्र का परिधान पहनो
हार से शृंगार हो,
और घूंघट में नहीं
उल्सित नयन में धार हो ,
शून्य बनकर अंक का अनुमान होगा
अब नया कोई बहाना छोड़ दो!

घाव के आंचल तले
ढक लो हृदय के पीर को,
ढूंढ लो खुशियां गमों में
काट दो जंजीर को ,
मत कहो अब स्वप्न को आघात होगा
कल्पना में ही नहाना छोड़ दो!

क्यों छले हो प्राण को
मन के गहन उच्छवास में ,
बचपना खोया कहीं जा
वृद्ध के विश्वास में,
फिर थपेड़ों स कहीं दो चार होगा
हार से अब दिल लगाना छोड़ दो!

बांध लो फिर से नुपुर को
वेदना के उच्च स्वर में,
सो सकोगे चैन से तब
राख में जल खाक होगा ,
हार मत मानो बड़ा अपमान होगा
और अपना सिर झुकाना छोड़ दो !

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