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EXCLUSIVE: जब ट्रेनों को खींचने के लिए होता था बैलों का इस्तेमाल

बड़ौदा रियासत में गायकवाड़ शासन की अपनी रेलवे थी, इस रेलवे को गायकवाड का बड़ौदा स्टेट रेलवे कहा जाता था

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siddharth tripathi

Feb 17, 2016

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उदय पटेल। गुजरात की बड़ौदा रियासत में गायकवाड़ शासन की अपनी रेलवे थी। इस रेलवे को गायकवाड का बड़ौदा स्टेट रेलवे (जीबीएसआर) कहा जाता था। खंडेराव गायकवाड के शासनकाल के दौरान रियासत का पहला रेलवे ट्रैक साल 1828 में बिछाया गया। उन्होंने इसी साल 13 किलोमीटर के डभोई से मियांगाम तक की रेलवे लाइन का उद्घाटन किया था। तब ट्रेन को खींचने के लिए बैलों का उपयोग किया जाता था। वर्ष 1863 में नेल्सन एंड कंपनी ने इस रेलखंड पर ट्रेन चलाने के लिए लोकोमोटिव का निर्माण किया। ब्रिटिश भारत में यह किसी भी रियासती राज्य की ओर से भारत की पहली नैरोगेज लाइन थी।

बाद में सयाजीराव गायकवाड तृतीय के शासन काल में रेलवे के नेटवर्क का विस्तार किया गया, लेकिन इस रेलखंड पर 1880 में नियमित रूप से लोकोमेटिव उपयोग नहीं किया गया। इस दौरान नैरोगेज रेलवे लाइन का जाल बिछाया गया जिसे बेचराजी तक विस्तार दिया गया। यह नेटवर्क अभी भी विश्व में सबसे बड़ा नैरोगेज रेलवे नेटवर्क है। साल 1949 में गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे को बांबे, बड़ौदा व सेन्ट्रल इंडिया रेलवे (बीबी एंड सीआई) में विलय कर दिया गया।

गायकवाड के पास था खुद का सलून
बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड के पास खुद का ब्रॉडगेज सलून भी था। इस सलून को बीबीएंड सीआई के परेल स्थित वर्कशॉप में वर्ष 1886 में बनाया गया था। अब इस सलून को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रेल संग्रहालय में रखा गया है।


बांबे, बड़ौदा व सेन्ट्रल इंडिया रेलवे
पश्चिमी रेलवे को पहले बांबे, बड़ौदा व सेन्ट्रल इंडिया रेलवे (बीबी एंड सीआई) के नाम से जाना जाता था। इस रेलवे की शुरुआत सूरत से उतरान के बीच 3.6 किलोमीटर छोटे रेल खंड से हुई। इस रेलखंड का उद्घाटन 10 फरवरी 1860 को किया गया। इसे दक्षिण की ओर विस्तार दिया गया जिससे यह बाद में बड़ौदा व मुंबई तक जुड़ा। अहमदाबाद मीटर गेज तक जुड़ा था। वहीं सूरत, वडोदरा ब्रॉड गेज से जुड़े थे। पूरे गुजरात में तब नैरोगेज का जाल बिछा था जिसमें गायकवाड का बड़ौदा स्टेट रेलवे तथा अन्य रियासती स्टेट की रेल प्रणालियां शामिल थी। धीरे-धीरे इस रेलवे में भी स्टीम लोको शेड व वर्कशॉप स्थापित किया गया।

रियासतों की रेलवे थी सौराष्ट्र रेलवे
सौराष्ट्र रेलवे का गठन अप्रैल 1948 में किया गया। इसमें भावनगर स्टेट रेलवे, गोंडल रेलवे, पोरबंदर रेलवे, जामनगर एंड द्वारका रेलवे, मोरबी रेलवे, ध्रांगध्रा रेलवे, ओखामंडल रेलवे, जूनागढ़ स्टेट रेलवे, बारिया लाइट रेलवे, राजपीपला रेलवे, भावनगर ट्रामवे शामिल थे। भारत की आजादी व रियासतों के विलयन के बाद विभिन्न स्टेट रेलवे को एक में शामिल करना अनिवार्य हो गया था। सौराष्ट्र व काठियावाड को सौराष्ट्र स्टेट में विलय कर दिया गया। इसी तरह केन्द्र सरकार ने गुजरात के विभिन्न स्टेट रेलवे को सौराष्ट्र रेलवे में विलय कर दिया। 5 नवंबर 1951 में बांबे, बड़ौदा एंड सेन्ट्रल इंडिया रेलवे, राजपुताना रेलवे, जयपुर स्टेट रेलवे, कच्छ स्टेट रेलवे का विलय करते हुए पश्चिम रेलवे बनाया गया।

कच्छ में भी अलग चलती थी रेल
कच्छ स्टेट रेलवे में नैरो गेज (762 मिलीमीटर) चला करती थी। यह रेलवे तुना बंदरगाह से उत्तर अंजार की तरफ चली थी। इस रेलवे को वित्तीय मदद महाराव खेंगारजी बावा से मिलती थी। अंजार से तुना के बीच का रेलखंड 1905 तक चला। वर्ष1900-01 में इस रेल खंड में पहली रेल बिछाई गई। अंजार से भुज के बीच में यह रेल लाइन 1901-02 में बिछाई गई। यह कार्य सन्1908 में पूरा किया गया। वर्ष 1912 में अंजार के निकट वर्सामेडी से भचाऊ तक 32 मील लंबी अतिरिक्त लाइन जोड़ी गई। 1930 से 1932 तक इसे 15 मील और कंडला तक जोड़ा गया। कच्छ स्टेट रेलवे 5 नवंबर 1951 तक पश्चिम रेलवे में विलय होने तक स्वतंत्र प्रणाली की तरह कार्यरत रहा।

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