
burnt waste in agriculture field
श्रीगंगानगर.
इन दिनों गेहूं की कटाई का सीजन जोरों पर हैं। ऐसे किसानों की संख्या कम नहीं है जो कंबाइन के माध्यम से फसल की कटाई करवाते हैं। अवशेषों को खेतों में ही जला रहे हैं। कंबाइन से फसल निकालने के बाद गेहूं, जौ का कचरा जलाने पर कचरे के साथ-साथ खेतों में मित्र कीट भी जल रहे हैं। समय और थोड़ा पैसा बचाने के लिए किसान खुद अपने खेतों की उर्वरकता को तो खत्म कर ही रहे हैं, साथ ही पर्यावरण और लोगों की सेहत को भी खासा नुकसान होता है। पड़ोसी राज्य पंजाब और हरियाणा में भी धान निकालने के बाद पराली को किसान जला देते हैं। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो अगर किसान नहीं जागे तो आगामी 15-20 सालों में खेतों की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो जाएगी। तापमान बढ़ेगा, जल मांग बीस फीसदी तक बढ़ेगी और उपलब्धता घट जाएगी।
क्या होता है कूप्रभाव
- मिट्टी के मित्र कीट नष्ट हो रहे हैं, इससे उत्पादन घट रहा है।
- किसान रासायनिक खाद पर निर्भर हो रहा है, खेती की लागत बढ़ रही है।
- मिट्टी की उपरी परत कड़ी होने से जलधारण क्षमता में कमी।
- फसल जल्द सूख जाती है, जल स्रोतों पर भार बढ़ रहा है।
- जमीन के बहुमूल्य पोषक तत्व नष्ट हो रहे हैं।
क्या करें कचरे का....
- कंबाइन से फसल निकालने के बाद अवशेष बच जाते हैं, मशीन लगाकर इससे पशुओं के लिए चारा बना सकते हैं।
- ईंधन के रुप में प्रयोग कर सकते हैं।
- जैविक खाद बना सकते हैं।
- गत्ता, कागज बनाने वाली कंपनियों, ईंट भट्ठों पर बेच सकते हैं।
खतरनाक है कचरा जलाना
- फसल निकालने के बाद कचरे को खेतों में ही जलाना खतरनाक है, इससे मिट्टी की भौतिक और जैविक दशा पर कूप्रभाव पड़ता है। जलधारण क्षमता कम हो जाती है। जलाने की बजाय कचरे को एकत्र कर कंपोस्ट खाद बना सकते हैं, रोटावेटर चलाकर कचरे को मिट्टी में मिला सकते हैं। वहीं अगर 15 दिन का समय हो तो रोटावेटर चलाने के बाद रुणी करते समय 15 से 20 किलो यूरिया प्रति बीघा डालने से कचरा शीघ्र ही गल सड़ जाता है।
डॉ. मिलिन्द सिंह, कृषि अनुसंधान अधिकारी।
Published on:
15 Apr 2018 06:44 pm

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