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लैला-मजनूं की अमर प्रेम कहानी का गवाह है राजस्थान का एक गांव ”बिंजौर”

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Laila-Majnoo Amar Prem Story

लैला-मजनूं की अमर प्रेम कहानी का ग्वाह है राजस्थान का एक गांव ''बिंजौर''

-राजस्थान दिवस विशेष

-राजस्थान के धोरों में दफन है अमर प्रेम की अमर कहानी

-लैला-मजनूं की अमर प्रेम कहानी का गवाह है राजस्थान का एक गांव ''बिंजौर''

-यहां हिन्दू करते हैै मजारों पर सजदा

अनूपगढ़.राजस्थान अपने आप में कई विशेषताएं और खूबियां रखता है,राजस्थान में कई दर्शनीय स्थल भी जिनके विश्व के पर्यटन मानचित्र पर अलग ही विशेषता है। मान्यताओं के अनुसार राजस्थान में एक स्थान ऐसा भी है जहां विश्व प्रसिद्ध एक प्रेमी जोड़े लैला-मजनूं ने अपने प्रेम को बचाने के प्रयास में अपनी जान दे दी लेकिन वह अपने प्यार को नही बचा सके।लैला मजनू ने राजस्थान के धोरों में भटक-भटक कर भूख और प्यास से तड़पते हुए बिना मिले ही अपनी जान दे दी थी। वह स्थान है राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के कस्बे अनूपगढ़ का गांव बिंजौर ।

भारत पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर बसे इस गांव में 2 मजारे है,मान्यताओं के अनुसार यह 2 मजारे प्रेमी जोड़े लैला मजनू की है। लैला-मजनूं का मिलन जिंदा रहते तो नहीं हो सका लेकिन मर कर भी अमर हो गए। इस मजारों पर पिछले लगभग 70 सालों से मेला भरता आ रहा है,तारबंदी से पूूर्व मजारों पर सीमापार के लोग भी सजदे के लिए आते थे। धीरे-धीरे इन मजारों के प्रति लोगों की आस्था बढ़ती गई और लैला-मजनूं का प्रेम अमर हो गया,इन मजारों पर लोग अपनी मन्नते लेकर आने लगे जो पूरी होने लगी जिससे इन मजारों की ख्याति दूर दूर तक होने लगी।

राजस्थान के पर्यटन के मानचित्र पर उभारने के लिए पर्यटन विभाग प्रयास करे तो यह स्थान पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो सकता है। समय अपनी गति से चलता गया धोरे के स्थानों पर किसानों की मेहनत तथा आधुनिक संस्साधनों से हरियाली ने ली। इन्ही मजारों के पास सीमा सुरक्षा बल की एक पोस्ट है मजनू जिसका नाम भी इसी लैला-मजनूं के नाम पर रखा गया है।

-लैला-मजनूं की मजार के प्रति ये है धारणा

लैला मजनू कमटी के पुराने सेवादारों ने मजार के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि वे 1962 से बिंजौर गांव में रह रहे हैं, तब यहां पूरे क्षेत्र में जंगल था और घग्घर बाढ़ के दिनों में लैला-मजनूं की मजार के चारों ओर भारी मात्रा में पानी भर जाने के बावजूद भी मजार में पानी नहीं जा पाता था। उन्होंने बताया कि 1965-66 में उन्होंने यह मंजर अपनी आंखों से देखा साथ ही मजार के ऊपर 2 दीपक अपने आप जलते और बुझते रहते थे।

सीमा पर तारबंदी से पूर्व पाक क्षेत्र से भी मुस्लिम लोग लैला.मजनूं की मजार पर मन्नत मांगने आया करते थे और उनसे ही जानकारी मिली थी कि यह मजार लैला-मजनूं की है और ये अमर है,उन्होंने सच्चा प्यार किया था। ग्रामीणों के अनुसार मजनूं और लैला दोनों ने की प्यास से तडप तडप कर यहां जान निकली थी,तभी से ही यह मजार बनी है।

उन्होंने बताया कि 1972 में इस मजार पर एक चमत्कार हुआ,उसके बाद मान्यता बढ़ती गई और भारी मेला लगने लगा, जनसहयोग से चंदा एकत्र करके कमेटी द्वारा हर साल मेले की सभी व्यवस्थाएं की जाती है। उन्होंने बताया कि मजार पर सच्चे मन से मन्नत मांगने वाले लोगों की मनोकामना अवश्य पूरी होती हैए इसलिए लैला-मजनूं की यह मजार प्रेमी जोड़ों के लिए आस्था का केन्द्र बनी हुई है।

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