
श्रीगंगानगर में खेत में किन्नू से लदे पेड़, पत्रिका फोटो
Kinnow Marketing: गंगानगरी किन्नू ने देश-विदेश में अपनी मिठास और गुणवत्ता का डंका बजाया है। एक दौर ऐसा भी रहा जब श्रीगंगानगर का किन्नू गुणवत्ता के मामले में पाकिस्तानी किन्नू को पीछे छोड़ते हुए निर्यात हुआ। अब हालात बदल गए हैं। आज सवाल यह है कि इतनी पहचान और मांग के बावजूद किन्नू का असली लाभ किसानों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह जिले में अब तक प्रसंस्करण इकाई का स्थापित नहीं होना है।
मेरा जिला मेरी उपज अभियान के तहत यह तथ्य उभरकर सामने आया कि जिले में किन्नू का रकबा लगातार बढ़ रहा है। यह फल कम पानी में तैयार होता है और जल संकट के दौर में भी किसानों के लिए भरोसेमंद विकल्प बना हुआ है। इसके बावजूद अधिकांश किसान किन्नू को केवल ग्रेडिंग और वैक्सिंग कर बेचने को मजबूर हैं। यदि जिले में प्रसंस्करण इकाई होती तो यही किन्नू जूस, जैम, जैली, मुरब्बा और अन्य पेय उत्पादों में बदलकर कई गुना मूल्य पर बिक सकता था।
किन्नू प्रसंस्करण इकाई को लेकर जिले में कई बार प्रयास किए गए, लेकिन हर बार प्रक्रिया किसी न किसी स्तर पर अटक गई। यदि यह इकाई स्थापित हो जाती है तो किसानों को स्थायी बाजार मिलेगा, किन्नू के दाम स्थिर रहेंगे और जिले में स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
जिला किन्नू उत्पादन में प्रदेश में अग्रणी है, लेकिन मूल्य संवर्धन के मामले में काफी पीछे है। सरकार को चाहिए कि वह किन्नू की प्रोसेसिंग, कोल्ड स्टोरेज और मार्केटिंग से जुड़ी सुविधाओं का विकास प्राथमिकता के आधार पर करे। इससे किसानों की आय बढ़ेगी।
जिले में किन्नू की गुणवत्ता, मात्रा और बाजार तीनों मौजूद हैं, लेकिन इनके समुचित उपयोग के लिए नीति समर्थन और औद्योगिक ढांचे की कमी है। जब तक किन्नू को केवल कच्चे फल के रूप में बेचने के बजाय उद्योग से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा।
सेवानिवृत उप निदेशक कृषि डॉ. मिलिंद सिंह का मानना है कि किन्नू जूस को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए रिसर्च और शोध बेहद जरूरी है। यदि स्थानीय स्तर पर रिसर्च सेंटर या प्रोसेसिंग यूनिट विकसित हो तो किन्नू आधारित उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। इससे किसानों की आय बढ़ेगी, युवाओं को रोजगार मिलेगा और मेरा जिला मेरी उपज अभियान को वास्तविक मजबूती मिलेगी।
सरकार और प्रशासन किन्नू को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं। 23, 24 और 25 जनवरी 2026 को प्रस्तावित पंच गौरव किन्नू महाकुंभ इसी दिशा में एक पहल है। हालांकि उत्पादकों का कहना है कि मेले जागरूकता तो बढ़ाते हैं, लेकिन स्थायी समाधान के लिए औद्योगिक ढांचे, कोल्ड स्टोरेज और मार्केटिंग व्यवस्था जरूरी है।
गंगानगरी किन्नू में गुणवत्ता, उत्पादन और बाजार तीनों मौजूद हैं। कमी केवल प्रसंस्करण, शोध और ठोस नीति समर्थन की है। जब तक किन्नू को कच्चे फल से आगे बढ़ाकर उद्योग का रूप नहीं दिया जाएगा, तब तक किसानों की आय बढ़ाने का सपना अधूरा ही रहेगा।
Updated on:
04 Feb 2026 01:42 pm
Published on:
04 Feb 2026 01:42 pm
