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श्रीगंगानगर की निरोल साबुन से एक सौ करोड़ का कारोबार

One hundred crore business from Sriganganagar's Nirol soap- दस हजार परिवारों के लिए रोजी रोटी बना कपड़े धोने का साबुन.

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श्रीगंगानगर की निरोल साबुन से एक सौ करोड़ का कारोबार

श्रीगंगानगर की निरोल साबुन से एक सौ करोड़ का कारोबार

श्रीगंगानगर. मध्यवर्गीय और जरुरतमंद परिवारों के लिए कपड़े धोने का साबुन दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। इस साबुन के निर्माण, बिक्री और परिवहन से जुड़े करीब दस हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है। पूरे जिले में यह साबुन बनाने की एक सौ से अधिक फैक्ट्रियां है।

लागत अधिक होने के कारण कई थोक विक्रेता पूरी सप्लाई नहीं कर पाते। सबसे पुरानी दुकान वाल्मीकि चौक एरिया में लायलपुर वालों की है। इसके अलावा प्रतिस्पर्धा के इस दौर में कई और नए ब्रांड भी बाजार में आ चुके है।

वहीं वाशिंग मशीनों का घर-घर इस्तेमाल बढ़ा है तो इस साबुन की बजाय वाङ्क्षशग पाउडर की खपत होने लगी है। कोरोनाकाल में सैनेटाइजर की तरह कपड़े धोने का साबुन का इस्तेमाल अधिक हुआ। यहां तक कि जिले में लोगों ने सैनेटाइजर से ज्यादा इस साबुन का उपयोग किया ताकि हाथ अच्छी तरह साफ हो सके।

वनस्पति तेलों से बनने वाली इस साबुन में नई नई वैरायटियां आने लगी है। लेकिन अधिकांश लोग पुराने ब्रांड की निरोल साबुन का ही इस्तेमाल करते है। पूरे जिले में हर साल इस साबुन का कारोबार एक सौ करोड़ पार हो चुका है। इधर, कई लोगों ने इस साबुन को अपनी दुकानदारी बना ली है।

फैक्ट्रियों या थोक विक्रेताओं से साबुन की पेटियां खरीदकर रिटेल का काउण्टर बनाकर दुकानदारी करने लगे है।

फैक्ट्री संचालक शंकर सेतिया का कहना है कि कपड़े धोने की साबुन का इस्तेमाल सिर्फ घरों तक सीमित नहीं रहा है। मिस्त्री, मजदूर, कारीगर आदि सब हाथ के हुनर वाले लोग हाथ धोने के लिए इस साबुन का इस्तेमाल करते है।

इसके साथ साथ टैंट का सामान, वाहन धोने, हॉस्पीटल में काम आने वाली चद्दर और अन्य कपड़ों की धुलाई भी इसी साबुन से होती है। इस कारण डिमांड लगातार बढ़ रही है। जितनी साबुन बनती है उससे दुगुनी डिमांड आ जाती है।

थोक विक्रेता रमनदीप सिंह का कहना है कि वर्ष 1960 में उनके दादाजी ने यहां निरोल साबुन बनाने का व्यापार शुरू किया था। पहले पाकिस्तान के लायलपुर शहर में रहते थे। वहां से यहां शिफ्ट हुए तो अपने पैतृक एरिया के नाम से दुकान संचालित करने लगे। निरोल साबुन के दो ब्रांड लवकुश और खादी का दबदबा आज भी कायम है।

अच्छी क्वालिटी की साबुन से चर्मरोग जैसी बीमारियां नहीं होती। कोरोनाकाल में यह साबुन अधिक कारगर रही। लोगों ने अपने हाथ धोने के लिए इस साबुन का अधिक इस्तेमाल किया।

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