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राजस्थान की इस बर्फी की पूरी दुनिया है दीवानी, जायका ऐसा कि एक बार खाते ही हो जाएंगे दीवाने

उत्तरी राजस्थान के इस जिले में पंजाबी और राजस्थानी संस्कृति का मेल होने से मीठे से ज्यादा नमकीन जायकों को ज्यादा पसंद किया जाता है। इसके बावजूद कुछ मीठे जायकों ने न केवल विशिष्ट पहचान बनाई है बल्कि देश के बाहर भी उनके स्वाद के रसिया हैं।

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Sriganganagar Kesrisinghpur Barfi : उत्तरी राजस्थान के इस जिले में पंजाबी और राजस्थानी संस्कृति का मेल होने से मीठे से ज्यादा नमकीन जायकों को ज्यादा पसंद किया जाता है। इसके बावजूद कुछ मीठे जायकों ने न केवल विशिष्ट पहचान बनाई है बल्कि देश के बाहर भी उनके स्वाद के रसिया हैं। ऐसा ही एक मीठा जायका है केसरीसिंहपुर की बर्फी। आम बर्फी से स्वाद और रंग रूप में अलग इस बर्फी की पैदाइश श्रीगंगानगर जिले के सीमावर्ती कस्बे केसरीसिंहपुर में हुई, इसलिए इसका नाम केसरीसिंहपुर वाली बर्फी पड़ गया।

देश के विभाजन के बाद मिंटगुमरी (अब पाकिस्तान में) से विस्थापित होकर केसरीसिंहपुर आए कश्मीरीलाल काठपाल ने 1957 में इस बर्फी को तैयार किया। पूंजी का अभाव था सो बाजार में ठेला लगाकर बर्फी को बेचना शुरू किया। बिस्किट से भी पतली और इलायची की महक लिए इस बर्फी का स्वाद ऐसा था कि केसरीसिंहपुर मंडी में लोगों की जुबान पर चढ़ गया। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बड़े बेटे संजय गांधी के शादी समारोह में केसरीसिंहपुर से भी कई कांग्रेसी नेता दिल्ली गए। वह लोग अपने साथ यही बर्फी ले गए। शादी समारोह में केसरीसिंहपुर की बर्फी मेहमानों में बांटी गई तो इसके स्वाद के खूब चर्चे हुए।

प्रसाद में पहली पसंद
श्रीगंगानगर में केसरीसिंहपुर की बर्फी 1984 में आई। कश्मीरीलाल काठपाल ने श्रीगंगानगर में इसकी बिक्री शुरू की तो मंगलवार के प्रसाद के रूप में यह लोगों की पहली पसंद बन गई। केसरीसिंहपुर की बर्फी का स्वाद तो लाजवाब था ही। आकार में पतली होने के कारण एक किलो बर्फी में 100 के करीब पीस चढ़ने के कारण शादी समारोहों में इसे प्रमुखता से परोसा जाने लगा। शत-प्रतिशत शुद्ध दूध से घर पर तैयार मावे से बनी केसरीसिंहपुर की बर्फी की एक विशेषता यह भी है कि यह दो-तीन माह तक खराब नहीं होती।

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कारोबार बढ़ाया नहीं
केसरीसिंहपुर बर्फी के जनक कश्मीरीलाल काठपाल का परिवार 1991 में केसरीसिंहपुर से श्रीगंगानगर आ गया। बर्फी की मांग बढ़ने के बावजूद इस परिवार ने कारोबार नहीं बढ़ाया। इसकी मुख्य वजह थी बर्फी में प्रयुक्त होने वाले मावे के लिए पर्याप्त मात्रा में शुद्ध दूध नहीं मिलना। वर्तमान में श्रीगंगानगर में इस परिवार की दो दुकानें हैं। एक दुकान कश्मीरीलाल काठपाल का बेटा राजकुमार काठपाल संभाल रहा है और दूसरी दुकान उनका पोता। बर्फी का निर्माण उसी तकनीक से होता है जो शुरुआत में अपनाई गई थी। राजकुमार बताते हैं कि कनाडा, ब्रिटेन, अमरीका और आस्ट्रेलिया में इस इलाके के जो लोग रहते हैं, वह जाते समय उनकी बर्फी बड़े चाव से खरीद कर ले जाते हैं। क्वालिटी से समझौता नहीं करने की नसीहत हमारे पिता ने दी थी सो कारोबार को बढ़ाया नहीं। आज भी हम उतनी ही बर्फी बनाते हैं, जितनी आसानी से बिक जाए।

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