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चूरू के स्वादिष्ट पेड़े देख मुंह में आ जाता है पानी, यूरोपियन व खाड़ी देशों में भी इनके दीवाने हैं लोग

मिठाई का नाम सुनते ही हर किसी के मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन चूरू शहर में बनने वाले पेड़ों का स्वाद सबसे अलग है। इसके स्वाद के यूरोपियन व खाड़ी देश में रहने वाले भी दीवाने हैं।

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चूरू

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kamlesh sharma

Oct 11, 2022

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चूरू। मिठाई का नाम सुनते ही हर किसी के मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन चूरू शहर में बनने वाले पेड़ों का स्वाद सबसे अलग है। इसके स्वाद के यूरोपियन व खाड़ी देश में रहने वाले भी दीवाने हैं। काफी वर्षों पहले चूरू शहर के कुम्भाराम सैनी ने इसे बनाने की कला को कोलकाता से सीखा था, जो कि उनकी तीसरी पीढ़ी को विरासत में मिली है। दिखने में सामान्य सा है, लेकिन इन पेड़ों का स्वाद ऐसा है कि एक जिसने चख लिया कायल हो जाता है। त्योंहारी सीजन में इसकी मांग और अधिक बढ़ जाती है। मनीष सैनी ने बताया कि उनके दादा कुम्भाराम सैनी व्यवसाय के लिए कोलकाता गए थे, जहां 1967 में बंगाली कारीगरों से पेड बनाने की कला को सीखा था। इसके बाद उनके दादा चूरू आ गए, पहले रेलवे में नौकरी की, लेकिन उन्हें रास नहीं आई तो रेलवे स्टेशन के पास दुकान लेकर मिठाई बनाने का काम शुरू किया।

पेड़े बनाने की कला ने दिलाई पहचान
कुम्भाराम सैनी के पौते मनीष ने बताया कि दादा ने जब पेडे बनाए तो स्वाद लोगों को काफी पसंद आया। उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे इसकी ख्याति फैलने लगी। सैनी ने बताया कि जिले के कई लोग काम के लिए दुबई, सऊदी अरब, आस्ट्रेलिया लोग ले जाने लगे। ऐसे में इन देशों के लोगों को भी पेडे अच्छे लगे। ऐसे में जब भी कोई भारत आता तो इन देशों के लोग उन्हें लौटते वक्त पेड़े लाने के लिए कहते हैं। उन्होंने बताया कि चूरू से लोग कमाने के लिए यूरोप व खाड़ी देश में जाते हैं, बीच-बीच में छुट्टियां लेकर आते हैं। चूरू आने वाले लोगों को प्रवासी लौटते वक्त पेड़ा लाने के लिए कहते हैं, यह सिलसिला लगातार जारी है। अब हर माह दुकान से पेडा दुबई, सऊदी अरब, आस्ट्रेलिया जाता है। इसके ऑर्डर लगातार मिलते हैं।

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दो प्रकार के बनाए जाते हैं पेड़े
उन्होंने बताया कि पेडे दो प्रकार के बनाए जाते हैं, एक छोटा जो कि पूजन में काम लिया जाता है। दूसरा बड़ा होता है जो कि खाने में काम आता है। उन्होंने बताया कि छोटे पेड में मीठा कुछ ज्यादा डाला जाता है। इसके लिए सुबह सात बजे से काम शुरू हो जाता है, जो कि शाम तक चलता है। प्रतिदिन करीब 50 किलो पेड़ा तैयार होता है, लेकिन हालत यह है कि शाम तक एक भी पेड़ा नहीं बचता।

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दुकान पर बनाते है मावा
पेडे बनाने के लिए बाहर का मावा काम नहीं लिया जाता है। सैनी ने बताया कि पेडे में सबसे महत्वपूर्ण मावा है, बाहरी मावे पर विश्वास नहीं करते। कारीगरों की मदद से इसे स्वयं ही तैयार करते हैं। सैनी ने बताया कि अच्छी तरह से सिकाई की जाती है जो कि इसके स्वाद को बढ़ाता है।

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