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खेतों में उगा बदलाव का जज्बा: उर्मिला ने बदली मिट्टी की कहानी

-बॉर्डर एरिया के गांव मदेरां की उर्मिला धारणिया ने जैविक खेती से लिखा एग्रोटेक का नया अध्याय

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  • -कृष्ण चौहान
  • श्रीगंगानगर.फसलें जब धरती पर उगती हैं तो किसान के चेहरे पर संतोष होता है, लेकिन जब उन्हीं खेतों से नवाचार, आत्मनिर्भरता और प्रेरणा उगने लगे, तो वह खेती पूरे समाज के लिए मिसाल बन जाती है। श्रीगंगानगर जिले के सरहदी गांव मदेरां की उर्मिला धारणिया ने खेती को सिर्फ आजीविका तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जैविक, टिकाऊ और महिला सशक्तीकरण से जोडकऱ एक प्रभावी एग्रोटेक मॉडल के रूप में विकसित किया है। सीमित संसाधनों और चुनौतीपूर्ण बॉर्डर एरिया की परिस्थितियों के बावजूद उर्मिला ने यह साबित कर दिया कि सही सोच और तकनीक से खेती लाभ और बदलाव दोनों का माध्यम बन सकती है।

जैविक खेती की राह चुनी

  • उर्मिला धारणिया ने 18 बीघा भूमि पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों का पूरी तरह त्याग कर जैविक खेती की राह चुनी। गेहूं, चना, सरसों और नरमा जैसी पारंपरिक फसलों के साथ-साथ मौसमी और माल्टा जैसी फलों की खेती भी वे प्राकृतिक तरीकों से कर रही हैं। खेतों में सहजन और बरमा डेक जैसे पेड़ों का रोपण कर उन्होंने प्राकृतिक विंड ब्रेक तैयार किया है, जिससे फसलें गर्म हवाओं और मौसम के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहती हैं। यह मॉडल मिट्टी संरक्षण और जलवायु संतुलन की दिशा में भी अहम साबित हो रहा है।

औषधीय और फूलों की खेती से बढ़ाई आय

  • एग्रोटेक नवाचार की सोच के तहत उर्मिला ने औषधीय और फूलों की खेती को आय का अतिरिक्त स्रोत बनाया। ऐलोवेरा के साथ गुलाब, गेंदा और ग्लेडियस की जैविक खेती से उनकी आमदनी बढ़ी है, वहीं खेतों में जैव विविधता भी मजबूत हुई है। उन्होंने देशी गाय, बकरियों, मुर्गियों और बतखों के पालन को खेती से जोड़ा है। गोबर से तैयार केंचुआ खाद ने मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को पूरी तरह खत्म कर दिया। घर पर बायोगैस संयंत्र के जरिए वे ऊर्जा के मामले में भी आत्मनिर्भर बनी हैं।

पानी बचाया,लागत घटाई और उत्पादन बढ़ाया

  • सिंचाई के क्षेत्र में उर्मिला ने आधुनिक तकनीकों को अपनाया। सोलर पंप, डिग्गी और ड्रिप सिंचाई प्रणाली ने पानी की बर्बादी रोकी, लागत घटाई और उत्पादन बढ़ाया। उनकी तकनीकी समझ अब आसपास के किसानों, विशेषकर महिलाओं के लिए सीखने का स्रोत बन रही है। उर्मिला अपने खेतों में काम के लिए गांव की महिलाओं को प्राथमिकता देती हैं, जिससे उन्हें रोजगार के साथ आत्मविश्वास और स्वावलंबन मिला है। उनका खेत आज ग्रामीण महिलाओं के लिए एक जीवंत प्रशिक्षण और प्रेरणा केंद्र बन चुका है।

कई बार मिला इनको सम्मान

  • जैविक खेती में उल्लेखनीय योगदान के लिए उर्मिला को 2020-21 में जिला स्तर पर सम्मान मिला, जबकि 2022 में स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर ने किसान सम्मान दिवस पर विशेष पुरस्कार प्रदान किया। उर्मिला धारणिया का यह सफर बताता है कि जब जज्बा, वैज्ञानिक सोच और तकनीक एक साथ मिलते हैं, तो खेती केवल पेशा नहीं रहती,बल्कि समाज को बदलने वाला आंदोलन बन जाती है।

वैज्ञानिक सोच और नवाचार से अपनाया

उर्मिला धारणिया ने जैविक खेती को वैज्ञानिक सोच और नवाचार से अपनाया है। वे जिले की महिला किसानों के लिए सशक्त किसान मॉडल प्रस्तुत करती हैं।

-सुशील कुमार शर्मा, सहायक निदेशक, कृषि (विस्तार),श्रीगंगानगर


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