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कुल देवता से आर्शीवाद लेकर घर बसायेंगे सलवा जुडूम के बाद वापस लौटे आदिवासी

सलवा जुडूम के बाद (salva judum) वापसी करने वाले आदिवासी परिवारों (tribal society) की ऐसी मान्यता है कि घर छोड़ने के कारण कुल देवी-देवता नाराज इसीलिए पहले उन्हें मनाना पड़ेगा। इसके लिए आदिवासी परिवार 12-13 जून को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कोन्टा में ग्राम देवताओं की पूजा करने जा रहे हैं। आदिवासियों (tribal tradition) में यह परंपरा है कि वे किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत पूजा से करते हैं इस परंपरा को पेन-पंडुम कहते हैं

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कुल देवता से आर्शीवाद लेकर घर बसायेंगे सलवा जुडूम के बाद वापस लौटे आदिवासी

सुकमा. छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर (Bastar) इलाके में साल 2005 में चलाए गए नक्सल विरोधी अभियान सलवा जुडू़म (salva judum) के कारण हो रहे हिंसा की वजह से कई आदिवासी परिवार (tribal society) अपने राज्य की जमीन छोड़कर आस-पास के राज्यों में चले गए थे। अब ये सभी (tribal) परिवार घर वापसी की तैयारी कर रहे हैं।

वापसी करने वाले आदिवासी परिवारों (Rehabilitation of tribals) की ऐसी मान्यता () है कि घर छोड़ने के कारण कुल देवी-देवता नाराज है इसीलि पहले उन्हें मनाना पड़ेगा।इसके लिए आदिवासी परिवार 12-13 जून को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कोन्टा में ग्राम देवताओं की पूजा करने जा रहे हैं।आदिवासियों में यह परंपरा (tribal tradition) है कि वे किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत पूजा से करते हैं इस परंपरा को पेन-पंडुम कहते हैं (पेन यानि देवता, पंडुम यानी त्योहार)।

आदिवासियों की पुनर्विस्थापन (Rehabilitation of tribals) में मदद कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि आदिवासी समुदाय हर साल इस समय अच्छी फसल के लिए ग्राम देवताओं की पूजा करते हैं लेकिन इस बार की पूजा अहम है क्योंकि सलवा जुडूम के दौरान विस्थापित हुए आदिवासी परिवारों का मानना है कि अपनी भूमि छोड़कर जाने से उनके कुल देवता नाराज हो गए हैं।

करीब 15 सालों से आदिवासी अपने ग्राम देवता की पूजा नहीं कर पाए हैं इस कारण वे पुन: विस्थापित होने से पहले नाराज चल रहे देवी-देवता को मनाने की कोशिश करेंगे। इस तरह की पूजा अपने आप में पहली बार हो रही है। आदिवासी अपने देवताओं और सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर आएंगे।

इस पूजा में घर वापसी की बाट जोह रहे हजारों की संख्या में आदिवासियों के आने की उम्मीद है। साल 2005 में सलवा जुडूम के दौरान हुए नक्सल विरोधी अभियान के कारण छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा, सुकमा, कोन्टा और बीजापुर इलाके में रहने वाले आदिवासी प्रभावित हुए थे।

जुडूम समर्थकों द्वारा गांव वालों को परेशान किया गया। इस आंदोलन में घरों को जला दिया गया, कई लोग मारे गए और 30 हज़ार से अधिक आदिवासियों को आंध्र और तेलंगाना के जंगलों में शरण लेनी पड़ी। इसका सही आंकड़ा किसी भी राज्य सरकार के पास नहीं है। इस तरह की पूजा अपने आप में पहली बार हो रही है। आदिवासी अपने देवताओं और सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर आएंगे। इस पूजा में घर वापसी की बाट जोह रहे हजारों की संख्या में आदिवासियों के आने की उम्मीद है।

आसान नहीं है घर वापसी

छत्तीसगढ़ (chhattisgarh) से विस्थापित (displaced tribal) और पड़ोसी राज्यों में जाकर बसे आदिवासियों को वापस लाने के प्रयास तेज हो गए हैं। शुभ्रांशु बताते हैं कि छत्तीसगढ़ से पड़ोसी राज्यों में विस्थापित हुए आदिवासी बाकी राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा में शेड्यूल्ड ट्राइब ( schedule tribe) में नहीं आते हैं, जिसके कारण उन्हें वो सुविधाएं नहीं मिल पाती है।

विस्थापित आदिवासियों (tribal society) को पुन: अपने गांव लौटने के मामले में वनाधिकार कानून की दिक्कत सामने आ रही थी। इस कानून के तहत 13 दिसंबर 2005 से पहले बसे लोगों को पट्टा देने का कानून है, लेकिन इसके लिए संबंधित व्यक्ति का उस जमीन पर लगातार काबिज रहना जरूरी है। अब इसमें समस्या यह है कि जो आदिवासी (tribal) साल 2005 में यानि लगभग 15 साल पहले अपनी भूमि छोड़कर गए हैं उन्हें यह फायदा मिलेगा कि नहीं, इस पर अभी पेंच फंसा है।