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विवाद के निबटारे से शुरू हुई ऐसी परंपरा कि 43 साल से जला रहे अहिरावण

रियासत काल की इस तहसील के बाशिंदे गुरुवार रात 43वां अहिरावण जलाएंगे। सोनेरी माता को भव्य शृंगार सेवा धराएंगे। हवन होगा और मेला भी भरेगा। सबकी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। राजस्थान पत्रिका ने आयोजन की पृष्ठभूमि पर नजर डाली।

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raghuveer singh

Apr 14, 2016

udaipur news

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कानोड़ में अहिरावण दहन आज : नगरपालिका ने पूरी की तैयारियां
कमलवाला तालाब की पाल पर भरेगा मेला

रियासत
काल की इस तहसील के बाशिंदे गुरुवार रात 43वां अहिरावण जलाएंगे। सोनेरी
माता को भव्य शृंगार सेवा धराएंगे। हवन होगा और मेला भी भरेगा। सबकी
तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। राजस्थान पत्रिका ने आयोजन की पृष्ठभूमि पर
नजर डाली।


दिलचस्प कहानी सामने आई। दरअसल, इस परंपरा की नींव वर्ष 1973 में
हुआ वह समझौता था, जो रुपयों के लेन-देन का विवाद निबटाने के लिए हुआ था।
दो समाजों की तकरार मिटाने के लिए हुई शुरुआत आज शिक्षा नगरी कानोड़ की
पहचान बन गई है। विवाद के रुपयों से शुरू हुआ यह मेला झगड़े से दूर रहने का
बड़ा संदेश देता है।

1973 में 38 फीट का था अहिरावण, गाजे-बाजे से निकलती थी। शोभायात्राक्षेत्र
के बुजुर्ग बताते हैं कि 1973 में कानोड़ भी पंचायत मुख्यालय था, तभी से
मेले की शुरुआत हुई। तब सरपंच बंशीलाल पुरोहित थे। कस्बे के गिरधारीलाल
सोनी, शिवलाल लक्षकार और मनोहरदास वैष्णव बताते हैं कि उसी दौर में सोनी व
लक्षकार समाज के दो परिवारों में किराये की दुकान को लेकर तकरार हुई थी।
लक्षकार समाज के चार भाई थे।


इनमें से एक भाई ने साझा दुकान सोनी समाज के
किसी व्यापारी को किराये दे दी। इस पर दूसरे ने आपत्ति उठा दी। विवाद बढऩे
पर उसने किरायेदार का सामान जबर्दस्ती खाली करवा दिया। दोनों समाजों के
पंचों ने सोनेरी माता मंदिर में विवाद निबटाना तय किया।


समझौते के तहत
किसने, किसे और कितने रुपए चुकाए, यह आज भी रहस्य है, लेकिन यह सर्वविदित
है कि रकम सोनेरी माता के पाट पर चढ़ाई गई थी। निर्णय हुआ था कि यह राशि
सर्वसामान्य के काम आएगी। तब बड़ी सादड़ी में चैत्र शुक्ल दशमी पर राम-रावण
का बड़ा मेला भरता था।


कानोड़वासियों ने भी वही राह ली, लेकिन अहिरावण दहन
की नई परंपरा जोड़ दी। समझौते की रकम से अहिरावण का पुतला बनवाने के साथ
मेले की तैयारियों पर हुआ। नाम दिया हनुमान-अहिरावण मेला। तब जोशीला हनुमान
मंदिर से गाजे-बाजे के साथ लक्ष्मण-अहिरावण, हनुमान और वानर सेना की
झाकियों वाली शोभायात्रा निकलती थी। यात्रा और मेले में नगर के साथ पड़ोसी
जिले चित्तौडग़ढ़ से भी ग्रामीण शामिल होते थे।


बदलाव : शोभायात्रा गायब, तीन दिन का हुआ मेला
जोशीला
हनुमान मंदिर पर बीते वर्षों में अनुष्ठान बढ़े हैं। हनुमान जयंती तक छोटा
मेला भी भरता है। हनुमान-अहिरावण की शोभायात्रा बंद हो चुकी है। पहले मेला
एक दिन था। फिर दो दिन का हुआ। इस वर्ष मेजबान नगरपालिका ने इसे तीन दिन
का कर दिया है। कस्बे के वरिष्ठ नागरिक बताते हैं, पहले पौराणिक प्रसंगों
का मंचन भी होता था।


मकसद यही था कि ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़ें। वीर बालक
अभिमन्यु पहला नाटक था। शोभायात्रा में कस्बे के युवा ही सुग्रीव,
लक्ष्मण, हनुमान आदि बनते थे। आयोजन से कुछ धन राशि भी जुटती थी, जो अगले
आयोजन में काम लेते। फिर राम लीला करवाई जाने लगी। अब कवि सम्मेलन और
सांस्कृतिक संध्या इस आयोजन का हिस्सा हैं।

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