1973 में 38 फीट का था अहिरावण, गाजे-बाजे से निकलती थी। शोभायात्राक्षेत्र
के बुजुर्ग बताते हैं कि 1973 में कानोड़ भी पंचायत मुख्यालय था, तभी से
मेले की शुरुआत हुई। तब सरपंच बंशीलाल पुरोहित थे। कस्बे के गिरधारीलाल
सोनी, शिवलाल लक्षकार और मनोहरदास वैष्णव बताते हैं कि उसी दौर में सोनी व
लक्षकार समाज के दो परिवारों में किराये की दुकान को लेकर तकरार हुई थी।
लक्षकार समाज के चार भाई थे।
इनमें से एक भाई ने साझा दुकान सोनी समाज के
किसी व्यापारी को किराये दे दी। इस पर दूसरे ने आपत्ति उठा दी। विवाद बढऩे
पर उसने किरायेदार का सामान जबर्दस्ती खाली करवा दिया। दोनों समाजों के
पंचों ने सोनेरी माता मंदिर में विवाद निबटाना तय किया।
समझौते के तहत
किसने, किसे और कितने रुपए चुकाए, यह आज भी रहस्य है, लेकिन यह सर्वविदित
है कि रकम सोनेरी माता के पाट पर चढ़ाई गई थी। निर्णय हुआ था कि यह राशि
सर्वसामान्य के काम आएगी। तब बड़ी सादड़ी में चैत्र शुक्ल दशमी पर राम-रावण
का बड़ा मेला भरता था।
कानोड़वासियों ने भी वही राह ली, लेकिन अहिरावण दहन
की नई परंपरा जोड़ दी। समझौते की रकम से अहिरावण का पुतला बनवाने के साथ
मेले की तैयारियों पर हुआ। नाम दिया हनुमान-अहिरावण मेला। तब जोशीला हनुमान
मंदिर से गाजे-बाजे के साथ लक्ष्मण-अहिरावण, हनुमान और वानर सेना की
झाकियों वाली शोभायात्रा निकलती थी। यात्रा और मेले में नगर के साथ पड़ोसी
जिले चित्तौडग़ढ़ से भी ग्रामीण शामिल होते थे।
बदलाव : शोभायात्रा गायब, तीन दिन का हुआ मेला